अस्सी घाट पर मंगलवार की रात लोक संस्कृति के विविध रंगों ने कभी लुभाया तो कभी दिल जीत लिया।
कजरी, बिरहा की लोक धुनें भी गूंजी और उड़ीसा के गावों से लेकर पश्चिम बंगाल तक के लोग नृत्यों की विविधता के बीच लय-ताल का ऐसा समन्वय स्थापित हुआ कि लोग झूमने लगे।इसमें अलग-अलग विधाओं के 342 कलाकारों ने प्रस्तुतियां दीं।
गंगोत्री से गंगा सागर के लिए निकाली गई गंगा सांस्कृतिक यात्रा के काशी पहुंचने पर यह प्रस्तुति पूर्व मध्य सांस्कृतिक केंद्र कोलकाता की ओर से की गई।
अस्सी घाट पर बने भव्य मंच पर मंगलवार की रात शुरुआत हुई उड़ीसा की नृत्यांगना तिरोश्वेता के ओडिशी नृत्य से। उन्होंने गंगा अवतरण की भावपूर्ण प्रस्तुति से वातावरण को मोहक बना दिया।
इनके बाद उड़ीसा के ही मलखम नृत्य की कलाकारों ने पारंपरिक वेशभूषा में प्रस्तुति की। इसके बाद पश्चिम बंगाल का जयढाक, श्रीखोल और फिर गौरीय नृत्य पर कलाकारों ने अपनी थिरकन से संगीत प्रेमियों को मुग्ध किया।
गोटीपुआ नृत्य के लिए कलाकार जब पारंपरिक वेश में मंच पर आए तब तालियों की बौछार होने लगी। पुरुलिया के छाऊ नृत्य के बाद बिहार के गांवों में लोकप्रिय छठ नृत्य की थिरकन हर किसी के लिए यादगार बन गई।
छठ मइया के गीतों पर कलाकारों ने सधे अंदाज में ठुमके लगाए। बिरहा, कजरी के बाद मध्य प्रदेश के गांवों में प्रचलित पारंपरित गीत पेश किए गए। संचालन मन्नू यादव ने किया।
पूर्व मध्य सांस्कृतिक केंद्र के निदेशक डॉ. ओम प्रकाश भारती ने बताया कि गंगोत्री से निकली यह सांस्कृतिक यात्रा गंगा सागर तक जाएगी। इस दौरान अन्य तटीय शहरों में भी गंगा तटों पर नृत्य-संगीत की प्रस्तुतियां की जाएंगी।