पहाड़ी पर उत्कीर्ण लेख और अशोक (कल्पना पर आधारित चित्र)
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आज इस हाईटेक दौर में भी गाहे-ब-गाहे धर्म और ईश्वर को संकुचित दायरों में बांधने की खबरें मिलती रहती हैं। आज भी कुछ मंदिरों में दलितों-स्त्रियों के प्रवेश पर प्रतिबंध है। ऐसे में अगर हम 2000 साल पहले के परिवेश की कल्पना करें तो पाएंगे कि वर्जनाओं-प्रतिबंधों का यह स्तर कितना सख़्त और क्रूर रहा होगा...।
बावजूद इसके आज से करीब 2250 वर्ष पहले चक्रवर्ती सम्राट अशोक ने एक विशाल चट्टान पर उत्कीर्ण कराए गए शिलालेख में लिखा - " शक्तिशाली धार्मिक जीवन न केवल धनी या बड़े लोगों द्वारा प्राप्त किए जाने योग्य है बल्कि इसे दलित या छोटे लोगों द्वारा भी प्राप्त किया जा सकता है...।"
अशोक की यह उद्घोषणा तत्कालीन कर्मकांडी ब्राह्मणों द्वारा धार्मिक कार्यों से दलितों को वंचित रखने के भ्रामक दुष्प्रचार का सीधे अर्थों में विरोध है। गंगा के विशाल मैदान को देश के दक्षिणी भाग से अलग करने वाली विंध्य पर्वत श्रृंखला में मनुष्य की विकास यात्रा के कुछ अहम पड़ाव आज भी सुरक्षित हैं।
उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जनपद के अहरौरा बाज़ार से करीब दो किलोमीटर दूरी पर है भंडारी देवी का मंदिर। तकरीबन 600-700 फ़ीट ऊंची पहाड़ी पर स्थित इस मंदिर से करीब सौ मीटर दूर एक विशाल आयताकार चट्टान पर खुदा है चक्रवर्ती सम्राट अशोक का यह शिलालेख। ग़ौरतलब है कि अबुल फ़जल ने "आइना-ए-अकबरी" में अहरौरा का उल्लेख 'अहिरवारा' नाम से किया है।
इससे पहले मौर्यकाल में यह मगध साम्राज्य का अंग था। चक्रवर्ती सम्राट अशोक (शासनकाल : 273-232 ईसा पूर्व) ने कलिंग युद्ध के बाद उपगुप्त नामक अर्हत से बौद्ध धर्म में दीक्षित होने के बाद देश-विदेश में कई स्थानों पर अभिलेख खुदवाए। अशोक के अब तक खोजे गए अभिलेखों की कुल संख्या 40 है। इन्हें तीन श्रेणियों में रखा गया है : 1- शिलालेख, 2- स्तम्भलेख और 3- गुहालेख।