कंधे पर झोला, सिर पर गठरी लिए अंतरगृही परिक्रमा पर निकले आस्थावान।
नंगे पांव कंधे पर झोला, सिर पर गठरी लिए महिलाओं का रेला मंगलवार को काशी के तीर्थों, शिवालयों और देवायतनों की परिक्रमा के लिए निकल पड़ा। उखड़ी सड़कों, तंग गलियों से होकर महिलाओं, किशोरों और बच्चों का कारवां दिन भर अंतरगृही परिक्रमा के पथ पर बढ़ता रहा। गंगा-वरुणा संगम तट पर बुधवार को बाटी-चोखा के भोग के साथ मणिकर्णिका घाट पर यात्रा पूरी होगी। मनसा, वाचा, कर्मणा तीनों तरह से जाने-अनजाने में हुए पापों के शमन और घर, परिवार, समाज की खुशहाली के लिए मार्गशीर्ष चतुर्दशी को काशी में अंतरगृही परिक्रमा की परंपरा है। इस दौरान रास्ते में पड़ने वाले 77 तीर्थों के फेरे लगाए जाएंगे।
गंगा स्नान के बाद मणिकर्णिका चक्रपुष्करिणी कुंड पर संकल्प लेकर महिलाओं ने भोर में अंतरगृही परिक्रमा आरंभ की। पूर्वांचल के अलावा आसपास के प्रदेशों से भी महिला श्रद्धालुओं ने अंतरगृही यात्रा में हिस्सा लिया। इस दौरान रास्ते में पड़ने वाले मंदिरों में दीपदान व पुष्प, अक्षत अर्पित करते हुए महिला श्रद्धालुओं की भीड़ ललिता घाट, मीर घाट, दशाश्वमेध घाट, हनुमान घाट से अस्सी और वहां से कमच्छा, सुकुलपुरा, ककरमत्ता होते हुए एफसीआई गोदाम के सामने से मंडुआडीह थाने पहुंचे। थाने के समीप सालकंट विनायक मंदिर में पूजन किया। मंडुवाडीह के आगे प्राचीन परिक्रमा पथ बंद होने के कारण उन्हें मंडुआडीह चौराहे से लहरतारा मार्ग होते हुए आगे बढ़ना पड़ा। वरुणापुल से राजा बाजार होते हुए श्रद्धालुओं ने चौकाघाट, वरुणा तट पर पड़ाव डाला। वहां गोहरी का अहरा जलाकर महिलाओं ने बाटी-चोखा का भोग लगाया। भोर में श्रद्धालुओं का कारवां आदिकेशव घाट के लिए रवाना होगा। नंगे पांव निकले श्रद्धालुओं के लिए 25किमी की यह यात्रा देर रात तक खराब सड़कों पर कम दुखदायी नहीं थी। बुधवार को गंगा-वरुणा संगम में डुबकी लगाने के बाद बाटी-चोखा का भोग लगेगा। घाट मार्ग से मणिकर्णिका लौट कर परिक्रमा पूरी की जाएगी।