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अमर उजाला संवाद: साहित्यकार बोले- काशी को हटा दिया जाए तो हिंदी का आधा साहित्य खत्म हो जाएगा

Sun, 29 Mar 2026 12:49 PM IST
Aman Vishwakarma अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।

सार

Amar Ujala Samvad: अमर उजाला कार्यालय में आयोजित संवाद कार्यक्रम में काशी के साहित्यकारों की उपस्थिति रही। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया पर तुकबंदी से तुरंतासाहित्य की कविताएं बाहर ही नहीं निकल पा रहीं हैं।
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अमर उजाला संवाद कार्यक्रम में शामिल काशी के साहित्यकार। - फोटो : संवाद
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विस्तार
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Varanasi News: काशी के ख्यात साहित्यकारों से लेकर बीएचयू के हिंदी विभाग के प्रोफेसरों ने नई पीढ़ी तक रील और व्हाट्सएप के माध्यम से पहुंचने वाले तुरंतासाहित्य को हिंदी के लिए खतरनाक बताया है। तुरंतासाहित्य यानी कुछ भी लिखकर सोशल मीडिया पर पोस्ट करते ही बिना पढ़े ही उस पर लाइक और कमेंट्स आ जाते हैं। 

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काशी में भक्ति काल से बदलते साहित्य के रूप विषय पर चांदपुर स्थित अमर उजाला कार्यालय में आयोजित संवाद में साहित्यकारों ने ये बातें कहीं।  कहा कि देश और काशी में साहित्य के चार स्तंभ मुंशी प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, भारतेंदु हरिश्चंद्र और आचार्य राम चंद्र शुक्ल ही हैं। यदि बनारस को निकाल दें तो फिर हिंदी का आधा साहित्य ही खत्म हो जाएगा। 

तुकबंदी और दिनचर्या के खांचे से ही बाहर न निकल पाने वाली ये कविताएं और गजलें वर्चुअल वर्ल्ड में सिर्फ लाइक-कमेंट के लिए पोस्ट की जाती हैं। अच्छी न हो तो भी आपको मिलने वाले लाइक्स और कमेंट बताते हैं कि लेखनी अच्छी है और सोशल मीडिया यूजर को आप हिंदी का असल पाठक मान खुद को रील वाला साहित्यकार मान बैठते हैं। संवाद में तुलसीदास और कबीरदास के भक्ति आंदोलन से लेकर बीएचयू के नव शोधार्थियों तक के समाज प्रेम और साहित्य प्रेम पर चर्चा की गई।

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असली युवा साहित्यकार विरक्ति में जी रहे
साहित्य ईश्वर से मानव केंद्रित हो गया है। समय कम है और बदलता तेज है। रील के दौर में दो से तीन मिनट में रचनाएं लिख दी गईं, लेकिन मौलिकता है ही नहीं है। असली रचनाकार रील या सोशल मीडिया में नहीं कहीं विरक्ति में हैं। हमारे पास आईआईटी सहित कई ऐसे छात्र हैं जिनकी कविताएं हमें झकझोरती हैं। - अंकित मिश्रा, शोध छात्र, हिंदी विभाग।

अब तनाव घटाने और सफलता की कुंजी की किताबें बिक रहीं
आलोचना और उपन्यासों के बुक स्टॉल्स पर तनाव कैसे दूर करें और सफलता की कुंजी की किताबें ज्यादा बिक रहीं हैं। साहित्य के पाठकों और लेखकों में वैचारिकता समाप्त हो गई है। पहले लोगों के घरों और अड़ियों पर साहित्यकारों की संगोष्ठियां होती थीं।  ये परंपराएं अब समाप्त हो गईं। आज की सोशल मीडिया आर्मी बिना छंद और मात्राओं के ज्ञान के बिना नवगीत लिखती है। लेकिन, ये युवा कवि अपनी दिनचर्या पर ही लेखन कर रही है। - डाॅ. इंदीवर, साहित्यकार

बिना विचारधारा के लेखक नहीं, हिंदी तुर्रा है 
आपके पास विचारधारा नहीं है तो अपने ढंग से कुछ भी लिखेंगे। हिंदी साहित्य विचारधारा के कारण ही बचा हुआ है। अब यूरोपियन भी कहते हैं कि हिंदी साहित्य में स्थिरता आई है। दिल्ली के एक लेखक ने कहा कि 40-50 साल में हिंदी खत्म हो जाएगी, लेकिन उनका जवाब दिया कि हिंदी तुर्रा है कल भी थी और आगे भी रहेगी। हां, मोबाइल की दुनिया में अंग्रेजी का विकास हिंदी से कहीं ज्यादा है। लेकिन, मुकाबला करना है तो उर्दू और हिंदी गजलों की मदद लीजिए। बनारस फिर से हिंदी साहित्य का प्रतिनिधित्व करेगा। बनारस-जैसा रचनात्मक लेखन दिल्ली में नहीं हो सकता। - प्रो. सुरेंद्र प्रताप सिंह, साहित्यकार।

काशी की महिलाएं लिख रहीं दोहे
जनता के संचित भाव का प्रतिबिंब साहित्य है। आज की टकराहट पुरातन परंपरा से है। सनातन ईश्वरवादी भी हैं और निरीश्वरवादी भी हैं। आस्तिक और नास्तिक भी है। सोशल मीडिया को दूर रख हमारे भावी समाज का धर्म मानव धर्म हो। महिला साहित्यकार खूब दोहा लिख रही हैं। डॉ. नीरजा माधव, लता चतुर्वेदी, मंजरी, रचना शर्मा बेहतर रचनाकार हैं, मगर काशी में कथा साहित्य कम लिखी जा रही है। सभी का रुझान गजल में ही है। - डॉ. मुक्ता, रचनाकार, आचार्य रामचंद्र शुक्ल की प्रपौत्री। 

हिंदी का गुणगान करने वाले उर्दू का दामन पकड़े हुए हैं 
सोशल मीडिया की जितनी भी नकारात्मकता बता लें लेकिन इसके फायदे उससे ज्यादा है। हिंदी का गुणगान करने वाले उर्दू का दामन पकड़कर चलते हैं। हिंदी के विद्यार्थी भी गजलों पर काम कर रहे हैं। हिंदी के छंदों का ह्रास हो रहा है। नए लोग सोरठा, छंद और चौपाई पर भी काम कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर गलत चीजें भी वायरल होती हैं, इससे बचना होगा। नई पीढ़ी को साहित्य से जोड़ने के लिए हमें कुछ नया करना होगा। उन्हें किताबें दी जाएं। वो इन किताबों को पढ़ें और अपनी टिप्पणी लिखें। इन्हें डिजिटल और प्रिंट समाचारों में स्थान देकर पुरस्कृत भी किया जाए। - दमदार बनारसी, कवि।

ताली बजवाना साहित्य की कद्र में नहीं आता
आज शब्द नहीं धुन अहम हो गया है। आजकल के प्रचलित गीतों को देखें तो हर कोई डांस करने के लिए सुन रहा है। ताली बजवाना साहित्य की कद्र में नहीं आता। वर्तमान में लिखना और रचना करना तुरंत हो रहा है। जबकि इसमें कभी उम्रें लग जाती थीं। फेसबुक पर लिखी कविता पढ़े बिना ही पसंद कर कमेंट करना एक खतरनाक साहित्यकार तैयार करने जैसा है। 1857 के विद्रोह ने साहित्यिक चिंतन को बदला मगर उसकी खूबी बरकरार रही। अब हो रहा बदलाव आधार को ही खत्म कर रहा है। सोशल मीडिया में आत्म विज्ञापन और आत्म मुग्धता का साहित्य है। - प्रो. वशिष्ठ अनूप, अध्यक्ष, हिंदी विभाग, बीएचयू 

पीएचडी धारक भी कर रहे भाषाई गलतियां
समकालीनता पर बोलने में कई खतरे होते हैं। काशी को छोड़ दें तो हिंदी का आधा साहित्य ही माइनस हो जाएगा। सोशल मीडिया की कविताओं में भाषा, लिंग व वाक्य की गलतियां हैं। यूजर्स में छटपटाहट है कि तुरंत बड़े कवि बन जाए। पुराने लोगों से नहीं सीख रहे हैं। पीएचडी किए हुए लोग भी भाषा की गलतियां करते हैं। - डॉ. सत्यपाल शर्मा, बीएचयू
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नामवर ने बनारस को साहित्य का पानीपत कहा
आचार्य नामवर ने बनारस को साहित्य का पानीपत कहा। कथा साहित्य भारतेंदु से आगे जाती है और केंद्र में प्रेमचंद होते हैं। आजादी के दौर से आगे काशी का अस्सी प्रकाशित हुआ। उसमें पूरे बनारस के बदलते रूप को आम लोगों तक पहुंचाया। 90 का दशक आया शिव प्रसाद सिंह, चंद्रकला, बलराज पांडेय ने कहानियां और कविताएं लिखीं। राजेंद्र आहुति हैं। - प्रो. नीरज खरे, बीएचयू
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