आनंद क्या है इस पर उन्होंने कहा कि दूसरे शहरों में लोग शवों को देखकर दूर भागते हैं, लेकिन काशीवासी शवों को ही धक्का देकर आगे निकल जाते हैं। बाहरी लोग काशी के अल्हड़पन से डर जाते हैं। ये वैसे ही है जैसे शिव को दूल्हा देख घराती भागते हैं। सैकड़ों को पीएचडी करा चुके प्रोफेसर घाट पर विस्फोट की परवाह किए बिना सोते हैं। ध्यान से देखो तो उसी घाट के नीचे एक देवता भी सोए होते हैं। इसी को आनंद कहा जाता है।
आनंद वाली काशी ने बुद्ध के दुखवाद को किया स्वीकार
काशी वेदमूलक है और भगवान बुद्ध विशुद्ध रूप से वेद को अस्वीकार करते हुए अपने मत का प्रतिपादन करते हैं। वेद आनंदवादी है और बुद्ध दुखवादी। काशी में आनंद वाद की गंगा तट पर दुखवाद का भी एक एक छत्र खड़ा हुआ, ये काशी की समावेशी दृष्टि है। काशी अपने आंचल में फक्कड़ कबीरदास और दूसरी ओर गोस्वामी तुलसीदास को भी रखती है।
ये कार्यक्रम काशी कथा न्यास, भारत अध्ययन केंद्र बीएचयू और इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र की ओर से कराया जा रहा है। दृश्य कला संकाय की संकाय प्रमुख प्रो. उत्तमा दीक्षित के निर्देशन में तैयार काष्ठ जिह्वा स्वामी के तैल चित्र का लोकार्पण भी किया गया। आईआईटी बीएचयू के पूर्व निदेशक प्रो. सिद्धनाथ उपाध्याय ने तमाम संस्कृतियों का उदाहरण देते हुए कहा कि काशी ने हमेशा से विश्व का मार्गदर्शन किया है। भारत अध्ययन केंद्र के समन्वयक प्रो. सदाशिव द्विवेदी, प्रो. उमाशंकर गुप्ता, प्रो. राणा पीबी सिंह, प्रो. अवधेश प्रधान, डॉ. प्रभाकर सिंह, डॉ. हरेंद्र राय, कला केंद्र के डॉ. अभिजीत दीक्षित, प्रो. पीके मिश्र, डॉ. सुजीत चौबे, डॉ. अमित पांडेय और डॉ. अवधेश दीक्षित आदि रहे।