कभी जो कीर्ति के शिखर पुंज थे, अब अपने पतन की कथा कह रहे हैं। शनै:शनै: संकुचित होते इस मंदिर संकुल की दयनीय दशा कह रहे हैं। एक ओर छैनी-हथौड़ों की चोट से ओट में छिपे कलात्मक शिवालय सहमे हुए बाहर झांक रहे हैं, वहीं दूसरी ओर आदिकेशव आवरण रहित होते हुए भी अनदेखे हैं।
मंदिर के सेवक स्वयं पुरातत्व विभाग से इसे अपने संरक्षण में लेने के लिए पत्र लिख चुके हैं लेकिन किसी ने इस प्राचीन विष्णु तीर्थ की सुध नहीं ली। कितनी बड़ी विड़ंबना है ना। कभी समय निकालकर चले आओ इस तीर पर... आओ कि आदिकेशव बुलाते हैं।
काशी में राजघाट से सराय मोहाना गांव के लिए रास्ता जाता है। वहीं गंगा-वरुणा संगम स्थली आदिकेशव घाट है। किनारे पर मकानों से घिरा हुआ आदिकेशव मंदिर समूह नजर आता है। अंग शिखरों से युक्त शिखर पुंज सहज ही ध्यानाकर्षित करते हैं। इस पौराणिक व ऐतिहासिक विरासत को सबने बिसार दिया है।
वरुणा की दशा सब जानते हैं। घाट का निचला हिस्सा कच्चा है। जहां भैंसों के झुंड नहाते दिखते हैं। एक परकोटे में चार मंदिर आदिकेशव, ज्ञानकेशव, पंचदेवता और संगमेश्वर हैं। स्थापत्य की दृष्टि से भी ये मंदिर दर्शनीय हैं।
आदिकेशव मंदिर का रंगमंडप लाल पाषाण के कलात्मक स्तंभों से समृद्ध हैं। बाहर की दीवारों पर भी सुंदर कारीगरी है। गर्भगृह में आदिकेशव विराजमान हैं। उनके दाईं ओर केशवादित्य हैं। दूसरे मंदिर में ज्ञानकेशव की मूर्ति स्थापित है। नीचे ज्ञानकेश्वर महादेव प्रतिष्ठित हैं। तीसरे मंदिर में संगमेश्वर महादेव के दर्शन हैं जिनकी गणना चतुर्दश आयतनों में होती है।
स्कंद पुराण के अनुसार इनका दर्शन कर मनुष्य पाप रहित हो जाता है। चौथा पंचदेवता मंदिर है। जहां एक पीठिका पर विष्णु, शिव, दुर्गा, सूर्य, गणेश का अंकन उनके वाहन द्वारा किया गया है। आदिकेशव मंदिर समूह में सन्नाटा पसरा रहता है। केवल कुछ तिथियों पर यहां श्रद्धा का समागम होता है।
पूस मास में अंतगृही मेला, चैत्र में वारुणी मेला में श्रद्धालु यहां संगम स्नान कर आदिकेशव के दर्शन करते हैं। भादो में वामन द्वादशी के दिन भी स्नान होता है। नीचे वामन भगवान का मंदिर भी है। परकोटे के बाहर चिंताहरण गणेश मंदिर है जिसमें गणेश जी के साथ वेदेश्वर, नक्षत्रेश्वर के शिवलिंग विराजमान हैं।