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देवताओं के स्वागत में सुरसरि के तट पर जलेंगे दीप

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मां जाह्नवी के अर्द्धचंद्राकार तट देव दीपावली की रात स्वर्णिम आभा से दैदीप्यमान होंगे। 84 घाट, कुंड, गलियां और घर की चौखट पर देवताओं के स्वागत में दीप जलाए जाएंगे। कार्तिक पूर्णिमा की रात सुरसरि के तट पर देवों की दीपावली की आभा चंद्रमा को भी चुनौती देगी। अस्सी से राजघाट तक दीपों की शृंखला के चंद्रहार की झिलमिलाती रौशनी से घाटों का शृंगार होगा।
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शुक्रवार की शाम को देव दीपावली महोत्सव का उल्लास उत्सवधर्मी शहर बनारस के जन-मन पर नजर आएगा। देर रात तक देव दीपावली की तैयारियों को अंतिम रूप दिया गया। काशी के घाट, कुंड, सरोवर, मंदिर और घरों की चौखट भी रौशन होगी। गंगा के तट से लेकर गंगा पार रेती तक दीपाें की लड़ियां जगमग होंगी। गंगा पार डोमरी में लगातार दूसरे साल भी देव दीपावली का विस्तार नजर आएगा। अलौकिक, अद्भुत और भव्य देव दीपावली के नजारे को आंखों में समा लेने के लिए काशी की जनता उमड़ेगी।
त्रिपुरासुर का हुआ था अंत
काशी विद्वत परिषद के संगठन मंत्री पं. दीपक मालवीय ने बताया कि धार्मिक मान्यताओं के अनुसार देवताओं की विनती पर भगवान शिव ने तीनों लोक में आतंक का पर्याय बने त्रिपुरासुर का वध किया था। देवताओं ने स्वर्गलोक में दीप जलाकर दीपोत्सव मनाया था। तब से कार्तिक पूर्णिमा को देव दीपावली मनाने की प्रथा लोक चलन में आई।
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हजारा दीप जलाकर हुई थी देव दीपावली की शुरुआत
गंगा तट पर पूर्णिमा पर मां गंगा को दीपदान की परंपरा रही है। वर्ष 1986 में पूर्व काशी नरेश विभूति नारायण सिंह ने धर्मगुरुओं की सलाह पर पंचगंगा घाट स्थित हजारा दीप को जलाकर देव दीपावली की शुरुआत कराई थी। वहीं प्राचीन दशाश्वमेध घाट पर सबसे पहले आरती की शुरुआत वर्ष 1991 से हुई है जबकि 14 नवंबर वर्ष 1997 से गंगा आरती यहां पर प्रतिदिन शुरू हुई।
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