फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

जरा याद करो कुर्बानी: जानिए वो किस्सा जब गोलियों की तड़तड़ाहट से दहल उठा था गोदौलिया

Wed, 10 Aug 2022 02:43 PM IST
वाराणसी ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी

सार

कला और संस्कृति के साथ ही बनारस की गलियों ने देश को आजादी को नया स्वरूप दिया। नरम और गरम दल के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने स्वतंत्रता आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। जरा याद करो कुर्बानी के जरिये उनकी वीरता, अदम्य साहस और त्याग को नमन करेंगे।
विज्ञापन
क्रांतिकारी मणींद्र नाथ बनर्जी - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

काशी की माटी की क्रांति का रंग एकदम चटख है। कला और संस्कृति के साथ ही बनारस की गलियों ने देश को आजादी को नया स्वरूप दिया। नरम और गरम दल के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने स्वतंत्रता आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। हम ऐसे ही देश के अमर वीर सपूतों की कहानियों से आपको रूबरू कराएंगे। जरा याद करो कुर्बानी के जरिये उनकी वीरता, अदम्य साहस और त्याग को नमन करेंगे।

विज्ञापन


लगभग सौ साल पहले बनारस का दिल कहे जाने वाला गोदौलिया चौराहा गोलियों की तड़तड़ाहट से दहल उठा था। क्रांतिकारी मणींद्र नाथ बनर्जी ने डिप्टी सुपरिंटेंडेंट ऑफ पुलिस और सगे मामा जेएन बनर्जी से ही मुठभेड़ ले ली। काकोरी कांड में भाग लेने वाले मणींद्र्र को कोई नहीं पहचानता था, उनके मामा काकोरी कांड के जांच अधिकारी थे।

लिहाजा हुकूमत ने उन्हें मणींद्र को गिरफ्तार करने का जिम्मा सौंपा। एक दिन अचानक मामा और भांजे की मुलाकात मारवाड़ी अस्पताल के सामने हो गई। मामा ने भांजे को आत्मसमर्पण करने को कहा। आजादी के मतवाले मणींद्र ने रिश्तों की परवाह न कर मामा पर फायर झोंक दिया।

विज्ञापन

बनारस के क्रांतिकारियों पर शोध कर रहे बनारस बार के पूर्व महामंत्री नित्यानंद राय ने बताया कि मणींद्र ने जब फायर झोंका तो पूरा इलाका गोलियों की तड़तड़ाहट से गूंज उठा। फायरिंग में जेएन बनर्जी बुरी तरह घायल हो गए और मणींद्र पकड़े गए।

गिरफ्तारी के बाद फतेहगढ़ सेंट्रल जेल में रखा गया था। बाद में 10 साल की कठोर सजा हुई । जेल के अंदर अमानवीय अत्याचारों के खिलाफ मणींद्र्र नाथ ने 66 दिन के अनशन के बाद 20 जून 1934 को मन्मथ नाथ की गोद में केंद्रीय कारागार फतेहगढ़ में अपने प्राणों की आहुति दे दी।
विज्ञापन

सातों भाई थे स्वतंत्रता सेनानी

आज भी 20 जून को मणींद्र के शहादत दिवस पर उन्हें याद किया जाता है। जेल में उनकी एक प्रतिमा भी लगी है। मगर काशी जहां वे पैदा हुए, पले बढे़ और शिक्षा ग्रहण की, अंग्रेजों से लोहा लिया वहां उन्हें याद नहीं किया जाता। पांडेयघाट के जिस मकान में मणींद्र नाथ ने जन्म लिया था, आज उसे कोई नहीं जानता है। शहीद मणींद्र्र नाथ बनर्जी के पिता का नाम डॉ. तारा चरण बनर्जी था। वह सात भाई थे और सभी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रहे।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें