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संस्कृत का ज्ञान बांटने में लगा है भदोही का यह मुस्लिम परिवार

Tue, 26 Nov 2019 01:02 PM IST
स्‍वाधीन तिवारी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भदोही
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सादिकुल के परिजन - फोटो : a
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काशी हिंदू विश्वविद्यालय के संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय में असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. फिरोज खान की नियुक्ति पर मचे घमासान के बीच भदोही जिले के एक मुस्लिम परिवार में मजहबी सौहार्द की खूबसूरत तस्वीर दिखी है। भदोही शहर के एमए समद इंटर कॉलेज में संस्कृत के लेक्चरर सादिकुल इस्लाम का पूरा परिवार संस्कृत भाषा के पठन—पाठन से जुड़ा पीढ़ियों से जुड़ा है। प्रधानाचार्य पद से सेवानिवृत्त उनके पिता मोहम्मद इस्लाम संस्कृत के शिक्षक रहे हैं। सादिकुल की दो बहनें भी संस्कृत पढ़ाती हैं। पत्नी ने भी संस्कृत में उच्च शिक्षा प्राप्त की है, मगर वह पढ़ाती नहीं हैं।

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अब उनका 10 वर्षीय बेटा भी संस्कृत की पढ़ाई में रुचि दिखा रहा है और भविष्य में उसकी भी इच्छा परिजनों की सोच को आगे बढ़ाने की है। बीएचयू में डॉ. फिरोज खान की नियुक्ति पर उठे विवाद पर सादिकुल इस्लाम कहते हैं कि संस्कृत पढ़ाने को लेकर उनके परिवार के साथ कभी कोई अप्रिय स्थिति सामने नहीं आई। अलबत्ता हर तरफ से इसकी सराहना ही हुई है। 

फिरोज खान की नियुक्ति पर बात की शुरुआत उन्होंने अयं निज: परोवेति गणना लघुचेतसाम। उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुंबकम... श्लोक से की। कहा, उदार लोगों का तो सब है। 15 वर्षों से भदोही में संस्कृत पढ़ा रहा हूं, लेकिन मुझे तो कभी ऐसा नहीं लगा कि मैंने कोई गलती की है। संस्कृत जोड़ने वाली भाषा है। 


गोरखपुर के रहने वाले सादिकुल ने बताया कि उनके पिता मो. इस्लाम, उनकी दो बहनें अफरोज फातिमा और शगुफ्ता इस्लाम और खुद उन्होंने गोरखपुर विश्वविद्यालय से संस्कृत में एमए, बीएड की डिग्री प्राप्त की है। तीनों भाई बहन विभिन्न कॉलेजों में संस्कृत पढ़ा रहे हैं। पत्नी निकहत पढ़ाती नहीं हैं, लेकिन उन्होंने भी संस्कृत में एमए, एमएड किया है। सादिकुल के पिता इस्लामिया इण्टर कॉलेज फिरोजाबाद से प्रधानाचार्य पद से सेवानिवृत्त हो चुके हैं। एक बहन शगुफ्ता संस्कृत में टॉपर थीं, जिसे तत्कालीन सांसद योगी आदित्यनाथ सम्मानित कर चुके हैं। उन्होंने गर्व से बताया कि उनके परिवार की तीसरी पीढ़ी के रूप में उनका बेटा तारिक इस्लाम अभी कक्षा छह में है, लेकिन उसने भी संस्कृत की ओर कदम बढ़ा दिए हैं।

मित्रों के सहयोग को भुला न सकेंगे

इस्लाम कहते हैं कि गोरखपुर विश्वविद्यालय में संस्कृत की पढ़ाई के समय के सहपाठियों के सहयोग को नहीं भुला सकते। विशेष रूप से योगेंद्रनाथ मिश्र और देवानंदधर दूबे का नाम लेते हुए कहा कि वे न मुझे कभी हिंदू लगे और न मैं उन्हें कभी मुसलमान प्रतीत हुआ। कॉलेज में पढ़ाई करते हम लोगों ने आपस में एक—दूसरे का सहयोग कर संस्कृत में तालीम पूरी की। उसी की देन है कि आज हम तीनों कहीं न कहीं संस्कृत पढ़ा रहे हैं।

पिता ने संस्कृत पढ़ने को प्रेरित किया

सादिकुल संस्कृत पढ़ने के लिए पिता मो. इस्लाम को प्रेरणास्रोत मानते हैं। बताया कि एमए, बीएड करने के बाद जब पिता की नौकरी मियां साहब इस्लामियां इंटर कॉलेज गोरखपुर में लग गई और सब कुछ सामान्य लगा तो उन्होंने हम भाई—बहनों को भी संस्कृत की पढ़ाई के लिए प्रेरित किया। नतीजा यह हुआ कि आज संस्कृत ने हम सबको एक मुकाम पर पहुंचा दिया है। संस्कृत की सेवा पर हम गर्व महसूस करते हैं।

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