तो देश का ऋण कैसे चुकाएंगे
रोचक बातें सुनकर रहा न गया तो पूछा अरे चचा रिटायरमेंट के बाद तो लोग पूजा-पाठ में जुट जाते हैं और आप राष्ट्रीय पर्वों को मनाने के लिए संगम आए हैं। इस पर राम प्रसाद कहते हैं, साल में दो ही तो प्रमुख राष्ट्रीय पर्व हैं। उसे भी न मनाया तो देश का ऋण कैसे चुकाएंगे। रही बात सनातन धर्म या अन्य धर्मों के त्योहारों की तो उसे भी परिवार समेत धूमधाम से मनाते हैं।
ये है माघ मेला का सार
इस पर फिर सवाल किया कि चचा आपको कैसा लग रहा है यहां आकर, माताफेर तपाक से बोल पड़े बहुत अच्छा लग रहा है, लेकिन और अच्छा लगता जब यहां अन्य शाही स्नानों की तरह राष्ट्रीय पर्वों पर भी एक शाही स्नान संत, महात्मा और श्रद्धालु करते। मैंने पूछा तो चचा आपकी यह ख्वाहिश है क्या, इस पर दोनों ने साथ में कहा बाबू... अगर सरकार और संत, महात्मा इस ओर ध्यान दे तो संभव हो सकता है।
आखिर सनातन धर्म, कर्म और देश पर चर्चा करने के लिए तो माघ मेला और कुंभ जैसे आयोजन बरसों से होते आ रहे हैं। यह बातें करते हुए हम पहुंच गए हनुमान मंदिर... पता चला कि दोपहर दो बजे के बाद दर्शन के लिए पट खुलेंगे। मैंने कहा अनुमति दें चचा वक्त कम है। आपकी नेक सोच शायद इस बार के माघ मेला का सार है। इस पर दोनों हंसते हुए बोले ...जय हिंद...।