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हर साल राष्ट्रीय पर्व पर करते हैं गंगा स्नान, कहते हैं- अरे बाबू...देश के लिए भी हो एक शाही स्नान

Wed, 29 Jan 2020 01:25 PM IST
गीतार्जुन गौतम हरिओम पांडेय, अमर उजाला, वाराणसी
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गंगा स्नान - फोटो : अमर उजाला।
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धर्म आस्था का विषय है, लेकिन देश सर्वोपरि है। इसलिए देश के राष्ट्रीय पर्वों को मनाना ही श्रेष्ठ है। कुछ ऐसी ही चर्चा कानों में पड़ी तो सहसा आंखें ढूंढने लगी महानुभावों को। पीछे देखा तो कुछ बुजुर्ग संगम स्नान कर शीशा कंघी कर रहे थे। खुद से रहा न गया और जा पहुंचा उनके बीच। उन बुजुर्गों ने भी अचरज भरी नजरों से देखा और पूछा कि का हो भैया कौनो काम रहला का... भोजपुरी निकली तो मैंने पूछ लिया अरे चचा मैं तो बनारस से माघ मेला में पुण्य की डुबकी लगाने आया हूं। बनारस का नाम सुनते ही बीरा चबा रहे चचा ने कहा, अरे भइया हमहूं त बनारस से ही आइल बानी।

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पूछा चचा कहां रहते हैं बनारस में तो, बोले कि मैं तो बिजली विभाग से रिटायर्ड कर्मचारी राम प्रसाद चौबे हूं। शिवपुर चौकी से कुछ दूरी पर रहता हूं। ई जवन साथ में हैं उ हमार पड़ोसी माताफेर तिवारी हैं। परिचय होते ही पूछा, चचा ये देश और धर्म पर क्या चर्चा कर रहे हैं। इस बीच बैग से पान का बीरा निकालकर मुंह में दबाते हुए माताफेर बोल पड़े... हमनी के ज्यादा त ना मालूम है, लेकिन हमनी का हर साल 26 जनवरी अउरी 15 अगस्त पर गंगा स्नान कर पुण्य कमाई ल जा।

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तीर्थराज प्रयाग पर श्रद्धा का राज
अरे अरे रुकिए... आप कहां बातों में मशगूल हो गए। बता दें कि यह चर्चा तीर्थराज प्रयाग में संगम की रेत पर चल रहे माघ मेला की है। जहां यूं तो बहुत से श्रद्धालु देश-विदेश से आते हैं। श्रद्धालुओं का मानना है कि गंगा-यमुना और सरस्वती के त्रिवेणी में आस्था की डुबकी लगाकर पुण्य लाभ अर्जित करना सनातन धर्म की संस्कृति है। इसलिए धार्मिक तिथियों पर मां की गोद में हर बालक स्नान करने दौड़ पड़ता है, तो हम भी आ गए संगम की रेती पर...बस इसी दौरान दोनों बुजुर्गों की बातों ने ध्यान खींच लिया। आइये अब आप भी जानिए इनकी प्रेरणादायी बातों को।

तो देश का ऋण कैसे चुकाएंगे
रोचक बातें सुनकर रहा न गया तो पूछा अरे चचा रिटायरमेंट के बाद तो लोग पूजा-पाठ में जुट जाते हैं और आप राष्ट्रीय पर्वों को मनाने के लिए संगम आए हैं। इस पर राम प्रसाद कहते हैं, साल में दो ही तो प्रमुख राष्ट्रीय पर्व हैं। उसे भी न मनाया तो देश का ऋण कैसे चुकाएंगे। रही बात सनातन धर्म या अन्य धर्मों के त्योहारों की तो उसे भी परिवार समेत धूमधाम से मनाते हैं। 



ये है माघ मेला का सार
इस पर फिर सवाल किया कि चचा आपको कैसा लग रहा है यहां आकर, माताफेर तपाक से बोल पड़े बहुत अच्छा लग रहा है, लेकिन और अच्छा लगता जब यहां अन्य शाही स्नानों की तरह राष्ट्रीय पर्वों पर भी एक शाही स्नान संत, महात्मा और श्रद्धालु करते। मैंने पूछा तो चचा आपकी यह ख्वाहिश है क्या, इस पर दोनों ने साथ में कहा बाबू... अगर सरकार और संत, महात्मा इस ओर ध्यान दे तो संभव हो सकता है।
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आखिर सनातन धर्म, कर्म और देश पर चर्चा करने के लिए तो माघ मेला और कुंभ जैसे आयोजन बरसों से होते आ रहे हैं। यह बातें करते हुए हम पहुंच गए हनुमान मंदिर... पता चला कि दोपहर दो बजे के बाद दर्शन के लिए पट खुलेंगे। मैंने कहा अनुमति दें चचा वक्त कम है। आपकी नेक सोच शायद इस बार के माघ मेला का सार है। इस पर दोनों हंसते हुए बोले ...जय हिंद...।
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