वाराणसी। फाग के रंग और सुबह ए बनारस का प्रगाढ़ रिश्ता काशी की विविधताओं का अहसास कराता है। स्वादिष्ट व्यंजनों की खुशबू के बीच रसभरी अक्खड़ मिजाजी और किसी को रंगे बिना नहीं छोड़ने वाली बनारस की होली नायाब है। जोगिरा की पुकार पर आसपास के हुरियारे वाह-वाही लगाए बिना नहीं रह सकते और यही विशेषता अल्हड़ मस्ती को दर्शाती है। इसके अलावा होली खेले रघुबीरा अवध में होली खेलैं रघुबीरा जैसे गीतों की धुनें भी भांग और ठंडाई से सराबोर पूरे बनारस को झूमा देती हैं। गंगा घाटों की मस्ती का यह आलम रहता है कि विदेशी पर्यटक भी अपने को रोक नहीं पाते और रंगों में सराबोर होकर ठुमके लगाते हैं।
ध्रुपद गायक पं. ऋत्विक सान्याल कहते हैं बनारस की होली में अलग ही उल्लास और उमंग है। जीवन को संपूर्ण रूप में जीने का जो अंदाज है काशी का वह कहीं और नजर नहीं आता है। धमार गायकी में तो होली के ही गीत हैं। होरी के ही पद गाए जाते हैं। इसका महत्व होली के महीने में ही है। इसको बसंत उत्सव के रूप में भी गाए जाते हैं। धमार के पद बहुत सुंदर हैं। राजस्थान की डागर परंपरा का यह एक हिस्सा है। वह गाते हैं राग सुहा में ऐ री मैं कासे कहूं जाए तो कान्हा तक तक मारत पिचकारी...। धमार गायकी में होली का सांगीतिक स्वरूप नजर आता है। यह हमारी परंपरा भी है।
पं. सान्याल का कहना है कि वह तो सांगीतिक होली ही खेलते हैं। राग भी एक रंग होता है और हम लोग तो साल भर रागों के रंग में ही डूबे रहते हैं। स्वर और सुरों के साथ होली खेलने का एक अलग ही आनंद है। काशी में होली का संबंध शिव से हैं। धमार परंपरा में कृष्ण और राधा का वर्णन ही मिलता है। एक पुराना पद राग सिंदूरा में गाते हैं बाजत ताल मृदंग, होरी के रंगीले ढंग, ब्रज की नारी गावत गारी, छिड़कत रंग हरि के संग...। बाबा विश्वनाथ की नगरी में यह फाल्गुनी बयार भारतीय संस्कृति का दीदार कराती है।