वाराणसी। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने अपने ऐतिहासिक बलिया व्याख्यान में सामाजिक समरसता का जो संदेश दिया वह डेढ़ शताब्दी बाद आज भी प्रासंगिक है। हिंदी के उत्थान में उन्होंने जो योगदान किया वह अतुलनीय है। राष्ट्रीय फलक पर हिंदी के महत्व को स्थापित करने में उनका महत्वपूर्ण योगदान है। उक्त विचार आधुनिक खड़ी बोली हिन्दी भाषा, साहित्य व पत्रकारिता के जनक भारतेन्दु हरिश्चंद्र की 168 वीं जयंती पर वक्ताओं ने व्यक्त किए। ठठेरी बाजार स्थित ऐतिहासिक भारतेन्दु भवन में रविवार को स्मृति-गोष्ठी का आयोजन किया गया।
अध्यक्षीय संबोधन में साहित्यकार डॉ. जितेंद्रनाथ मिश्र ने कहा कि भारतेन्दु बाबू ने हिन्दी भाषा-साहित्य के निर्माण में ही नहीं बल्कि भारतीय समाज को एकजुट करने में महान योगदान किया। उन्होंने एक ओर सत्य हरिश्चन्द्र नाटक के रूप में ऐसी रचना लिखी जिससे प्रेरित हो महात्मा गांधी ने सत्य-अहिंसा का मार्ग अपनाकर भारत के इतिहास की धारा बदल दी। वहीं पवित्र ग्रंथ कुरान को हिन्दी रूप देकर और मोहम्मद साहब की जीवनी लिखकर सामाजिक एकजुटता की नींव रखी। भारतेन्दु हरिश्चंद्र के प्रपौत्र दीपेशचंद्र ने हरिश्चन्द्र के प्रेरक जीवन-प्रसंगों का उल्लेख किया। गोष्ठी में काशी विद्यापीठ के पत्रकारिता विभाग के भूतपूर्व अध्यक्ष डॉ. अर्जुन तिवारी, संस्कृत के विद्वान डॉ पवन शास्त्री, नाट्य शास्त्री डॉ. राजेन्द्र उपाध्याय, कवि बृजेश पांडेय, समाजसेवी वल्लभ दास, उपन्यासकार श्याम बिहारी श्यामल, कथाकार सविता सिंह, वेदांत सोसायटी के महेंद्र पांडेय, रूप कृष्ण चैतन्य ने विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम के संयोजक मालिनी चौधरी व कंदर्पचंद्र और राजकृष्ण अग्रवाल व दीपाली अग्रवाल रहे।