वाराणसी। गंगा की अविरलता, निर्मलता पर सरकार करोड़ों रुपये खर्च कर रही है, लेकिन स्थिति जस की तस बनी हुई है। गंगा का पानी नहाने लायक नहीं है और तो और इसमें स्नान से खुजली सहित अन्य संक्रामक बीमारियां हो रहीं हैं। आईआईटी के सिविल इंजीनियरिंग विभाग की ओर से आयोजित तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में भाग लेने बीएचयू आए जलपुरुष राजेंद्र सिंह ने कहा कि गंगा की दुर्दशा के लिए सरकार जिम्मेदार है।
बीएचयू के स्वतंत्रता भवन में उन्होंने कहा कि गंगा को यदि ठीक करना है तो पहले इसे गंदगी मुक्त करना होगा। गंगा की दशा अस्पताल के आईसीयू में भर्ती मरीज जैसी है, जिसे बेहतर इलाज की तत्काल जरूरत है, न कि थोड़ी बहुत जांच कर अस्पताल से छुट्टी दे दी जाए। एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि गंगा निर्मलता के लिए नमामि गंगे सहित जितनी भी योजनाएं सरकार की ओर से चलाई जा रही हैं, उसमें सिर्फ पैसे की बंदरबांट हो रही है, किसी का ध्यान गंगा की दुर्दशा पर नहीं जा रहा है।
उन्होंने गंगा के लिए कानून बनाए जाने की मांग करते हुए कहा कि इसे राष्ट्रीय प्रोटोकाल देना होगा। पहले गंगा का बहाव 62 प्रतिशत था जो अब केवल 20 प्रतिशत रह गया है। कुंभ में भी गंगा का पानी पीने और नहाने लायक नहीं है। बनारस में गंगा का शुद्घ जल नहीं आता है, कानपुर में चमड़ा उद्योग का पानी और हरिद्वार, बिजनौर से लेकर जितने भी शहर है, सभी जगहों से नालों का पानी भी गंगा में ही गिर रहा है। इससे पहले उन्होंने संगोष्ठी में गंगा सद्भावना यात्रा पर प्रकाशित पुस्तक का विमोचन किया।
बीएचयू स्वतंत्रता भवन में तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी के पहले दिन वक्ताओं ने गंगा की अविरलता-निर्मलता पर चर्चा की। नदी स्वास्थ्य-आकलन से पुर्नस्थापना (आरएचएल-2019) विषयक संगोष्ठी में फ्रांस के लियोन विज्ञान शोध संस्थान के निदेशक प्रो. हार्वे, कार्यवाक निदेशक प्रो. एसके सिन्हा, आस्ट्रेलिया से प्रो. माहेश्वरी, प्रो. मुकुंद एस बाबेल ने नदी के प्रवाह और प्रदूषण पर मंथन किया। 16 फरवरी तक चलने वाली संगोष्ठी में 11 तकनीकी सत्रों में नदी के स्वास्थ्य और उसके आकलन पर चर्चा होगी। अतिथियों का स्वागत संयोजक प्रो. प्रभात कुमार सिंह और समन्वयक प्रो. एसबी द्विवेदी ने किया। इस दौरान प्रो. बृंद कुमार, प्रो. राजेश सिंह, डॉ. वालिंद महेंजी, डॉ. राकेश कुमार आदि मौजूद रहे।