वाराणसी। काशी को शहर कहना है नाइंसाफी है। ये सिर्फ घाटों, मंदिरों का शहर नहीं बल्कि संस्कृति है। इसका एक वृहद इतिहास है। वो संस्कृति, वो इतिहास तथ्यों पर आधारित है। इसमें धर्म भी है और अध्यात्म भी। गंगा किनारे अर्द्ध चंद्रमा का आकार, यही इसकी खूबी और खूबसूरती है। यहां की नायाब संपदा है। दो शहरों को छोड़ पूरा हिंदुस्तान घूम चुके जाने माने ट्रेवलर व फोटोग्राफर मोहित खरबंदा काशी को इसी नजरिये से देखते हैं। शनिवार को वो शहर में थे।
मोहित कहते हैं कि एक घुमक्कड़ और एक फोटोग्राफर के तौर पर यहां बहुत कुछ है। काशी जीवंत है और यहां की संस्कृति, धर्म व अध्यात्म ही इसे जीवंत बनाती है। एक ऑटोमोबाइल कंपनी में ब्रांड मैनेजर के तौर पर काम कर रहे मोहित 2009 में पहली बार काशी आए थे, वो भी मंकी बाबा का नाम सुनकर। वही मंकी बाबा, जो आपको अस्सी घाट जाते वक्त आपको अपने बंदर के साथ बातचीत करते नजर आते हैं। मोहित बताते हैं कि मैं यहां 2009 में आया। यहां की गलियों, घाटों ने मुझे ऐसा आकर्षित किया कि अगले तीन साल में आठ बार यहां आया। दो तीन दौरे तो मुझे इसे समझने में लगे। सुबह-ए-बनारस से जगने और गंगा आरती की मनोरम छटा से सजने वाले हर घाट की अपनी अलग कहानी है। काशी के मुक्ति भवन जैसा दुनिया में कहीं नहीं। फोटोग्राफी के लिए यहां बहुत कुछ है। साधु संत, सुबह-ए-बनारस, गंगा आरती सब सुकून देने वाले हैं। मैं इनमें ह्यूमन एंगल भी तलाशता हूं।