वाराणसी। गालिब की नजर से कैसा दिखता है बनारस। एक प्रख्यात शायर प्राचीन शहर को किन शब्दों में संजोए है। बानगी के साथ शब्दमाला में पिरोया है। साहित्य की दुनिया का यह सौंदर्य फिल्म काबा-ए-हिंदुस्तान में देखा जा सकता है। फिल्म का प्रमोशन बीएचयू के संगीत एवं मंच कला संकाय के पं. ओंकारनाथ ठाकुर प्रेक्षागृह में 13 नवंबर को होगा। दोपहर साढ़े 12 बजे फिल्म निर्देशक बीनू राजपूत की मौजूदगी में पहली बार इस फिल्म को गालिब के शहर काबा-ए-हिंदुस्तान में दिखाया जाएगा।
निर्देशक बीनू बताती हैं कि इस फिल्म में बनारस की मौज, सौंदर्य के साथ ही हर उस पक्ष को संजोया गया है जिसे गालिब ने शब्दों से संवारा है। बनारस में गालिब ने वर्ष 1827-1828 में फारसी मसनवी चराग-ए-दैर लिखा था। इसी शहर मेें पांच दिन गुजारे थे। सामान्य भाव में चराग-ए-दैर का मतलब मंदिर का दीप होता है। बनारस में रहने के दौरान गालिब ने बनारस के घाटों, लाला के फूल, भंवरों की गुनगुनाटए तंग गलियों, मंदिर की आरती और बनारस के मिजाज को कलमबद्ध किया है। इस नगर को हिंदुओं की इबादतगाह और हिंदुस्तान का काबा उन्होंने कहा था। इस फिल्म की पूरी शूटिंग बनारस में की गई है। पटकथा लिखी है वसीम हैदर हाशमी ने। उद्घाटन अवसर पर मुफ्ती-ए-शहर मौलाना अब्दुल बातिन नोमानी, प्रो. याकूब यावर, डॉ. श्रीकांत मिश्र, आचार्य नंदिता शास्त्री, प्रो. वजीर हसन, डॉ. मोहम्मद अकील, डॉ. ए आफाकी के साथ ही संकाय प्रमुख, आईसीसीआर के क्षेत्रीय अधिकारी अनुराग सिंह मौजूद रहेंगे। फिल्म निर्माण मेें गालिब इंस्टीट्यूट दिल्ली, प्रीसियस प्लानेट चैरिटेबल ट्रस्ट, रामपुर राजा लाइब्रेरी और बीएचयू के विषय विशेषज्ञों का सहयोग के इस फिल्म को प्रदर्शित किया जाएगा।