रामनगर। माता मुझे भूख लगी है। सीता जी से आज्ञा लेकर हनुमान जी अशोक वाटिका के फल खाने लगे और पेड़ों को तहस नहस करने लगे। रखवाले आए तो उन्हें पीटकर भगा दिया। रावण तक जब यह बात पहुंची तो उसने बहुत से योद्धाओं को उन्हें पकड़ने के लिए भेजा।
रामनगर की विश्व प्रसिद्ध रामलीला में 19वें दिन हनुमान जी का सिंधुपार गामन, श्री जानकी दर्शन और लंका दहन की लीला संपन्न हुई। सुंदरकांड के दोहा एक से 33 तक का प्रसंग मंचित हुआ। हनुमान जी के चरण पड़ते ही मैनाक पर्वत धंस जाता है। उन्हें देखकर सुरसा प्रसन्न होकर कहती है कि आज मुझे अच्छा आहार मिला है। सुरसा उन्हें खाने के लिए मुंह खोलती है तो हनुमान जी भी अपना विस्तार करते हैं और अंत में सूक्ष्म रूप लेकर सुरसा के मुख से बाहर आकर उसे प्रणाम करते हैं। आगे छाया को पकड़ने वाली राक्षसी को मारकर सुबल पर्वत पर चढ़कर लंका का भव्य रूप देखा। लंकनी को घूंसा मारकर वह लंका में प्रवेश करते हैं और विभिषण के घर पहुंच जाते हैं। विभिषण से उन्हें सीताजी के अशोक वाटिका में होने की जानकारी मिलती है। उधर, रावण अशोक वाटिका में सीता जी को रानी बनाने के लिए दबाव बनाता है। उनके इंकार करने पर राक्षसियों से उन्हें प्रताड़ित करने की कहकर चला जाता है। सीताजी के आगे राम की मुद्रिका हनुमान गिराते हैं और उन्हें रामकथा सुनाते हैं। सीता जी को अपना परिचय और प्रभु का संदेश देने के बाद फल खाने की आज्ञा मांगते हैं। अक्षय कुमार के वध के बाद रावण पुत्र मेघनाद को हनुमान जी को पकड़ने के लिए भेजता है। मेघनाद ब्रह्मास्त्र से बांधकर हनुमान जी को रावण के दरबार में लाते हैं। रावण सेवकों को हनुमान जी की पूछ में आग लगाने का आदेश देता है। हनुमान जी पूरी लंका जला डालते हैं और पूंछ बुझाने के बाद वापस सीताजी के पास आकर रामजी के पास लौटने की आज्ञा मांगते हैं। सीता जी उन्हें अपनी चूड़ामणि उतारकर देती हैं।
प्रभु राम को हनुमान जी लौटकर सीता माता का संदेश सुनाते हैं। वानर दल जय जयकार करते हैं। यहीं पर भगवान की आरती के बाद लीला को विश्राम दिया जाता है।