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अवैध बुनियाद पर मिल रही जायज सुविधाएं

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वाराणसी। शहर में अवैध कॉलोनियां यू ही नहीं आबाद हुईं। वीडीए ने मनमानी रोकने से आंखे फेरकर तो बेड़ा गर्क किया ही, बिजली, नगर निगम, जलकल, पीडब्ल्यूडी जैसे विभागों ने भी नियम-कानूनों को दरकिनार कर खूब मलाई काटी। कॉलोनियों के अवैध होने के बावजूद बिजली, पानी और सीवेज के वैध कनेक्शन जारी कर दिए गए। सरकारी रकम से सड़कें बनवा दी गईं। अब बड़ा सवाल यह है कि जब वीडीए का दावा है कि ये कॉलोनियां अवैध हैं तो वहां बिजली-पानी के वैध कनेक्शन और नगर निगम की ओर से मकान नंबर जारी कैसे कर दिए गए।
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तकरीबन पांच सौ से अधिक अवैध कॉलोनियों से शहर जकड़ चुका है। वहां बुनियादी सुविधाओं के लिए जरूरी संसाधन उपलब्ध नहीं हैं। शहर के बुनियादी संसाधनों का ढांचा चरमराने की बड़ी वजह ये अवैध कॉलोनियां हैं। वीडीए से बिना ले आउट और नक्शा पास कराए ही कॉलोनियां बनती चली र्गइं। जिला प्रशासन से शासन तक के आलाधिकारी हों या मुलाजिम किसी ने कोई रोकटोक की जरूरत नहीं समझी। 1990 के बाद से अब तक किसी भी कॉलोनी का भी लेआउट और नक्शा वीडीए से पास नहीं कराया गया। इसका खुलासा खुद वीडीए उपाध्यक्ष पुलकित खरे कर चुके हैं। ऐसे में बड़ा सवाल है कि अवैध कॉलोनियों में बिजली और जलकल विभाग ने बिजली, पानी और सीवेज के कनेक्शन किस आधार पर दिए।
सरकारी धन से सड़कें कैसे बनती चली गईं। कई जगह तो वैध कालोनियाें की तुलना में बिना ले आउट वाली कॉलोनियों में बेहतर सुविधाएं हो गई। डेवलपर्स और अधिकारियों की मिलीभगत ने अनियंत्रित विकास को बढ़ावा देकर शहर के लिए चुनौतियों की बाढ़ ला दी। शहरी सीमा से सटे बाहरी इलाकों लंका, सामनेघाट, पांडेयपुर-आजमगढ़ रोड, आशापुर, शिवपुर में तो हालात सबसे अधिक अनियंत्रित हैं। बढ़ती आबादी के दबाव के चलते सीवेज, पेयजल की समस्या बढ़ती जा रही है। अब अवैध कॉलोनियों को नियमित करने का मामला शासन में विचाराधीन हैं और जानकार भी मानते हैं कि इसके सिवा कोई और विकल्प नहीं है। लेकिन, बड़ा सवाल यह है कि नियमों को दरकिनार करने वाले संबंधित विभागों के जिम्मेदार अधिकारियों, कर्मचारियों पर कार्रवाई क्यों नहीं की गई?
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