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या तो शहर बना दो, नहीं तो गांव जिंदा रहने दो

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वाराणसी। पंचायती राज व्यवस्था लागू होने के बाद गांवों के विकास में निश्चित रूप से तेजी आई। पूरा स्वरूप बदल गया लेकिन शहरी सीमा से सटे गांवों में शहरीकरण से चुनौतियां बेतहाशा बढ़ीं। अब बहुत जरूरी है कि इन गांवों को शहर में शामिल कर उन्हें समस्याओं के मकड़जाल से बाहर निकाला जाए। या फिर इन ग्राम पंचायतों को संसाधनों और अधिकारों से इतना ही समृद्ध किया जाए कि वे खुद बेहतर तरीके से चुनौतियों से निबट सकें।
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मंगलवार को चांदपुर स्थित कार्यालय में अमर उजाला संवाद में आए ग्राम प्रधानों ने शहर से सटे गांवों के हालात और उनकी चिंताएं साझा कीं। कहा कि नगर निगम और गांव के फेर में बुनियादी व्यवस्थाएं लड़खड़ाती जा रही हैं। पिछली सरकार में शहर से सटे 78 गांवों को निगम प्रशासन ने नगरीय सीमा में शामिल करने के लिए शासन को प्रस्ताव भी भेजा था लेकिन उस पर कोई निर्णायक पहल अब तक नहीं हो पाई। ग्राम पंचायतों के अपने सीमित संसाधन हैं लेकिन पूरी तरह शहरीकरण में जकड़ चुके इन गांवों की बुनियादी जरूरतें कई गुना बढ़ चुकी हैं। जहां कभी खेती-किसानी हुआ करती थी, वहां कॉलोनियों का जाल बिछ चुका है। कूड़ा प्रबंधन और सीवेज निकासी की समस्याएं विकराल रूप लेती जा रही हैं। गांवों में एक तो पर्याप्त सफाई कर्मी नहीं हैं। दूसरे जो सफाई कर्मी हैं वो ब्लाक और अफसरों के यहां हाजिरी लगाते हैं। गांव में सफाईकर्मी जाते ही नहीं हैं। शहर में टॉयलेट निर्माण के लिए 20 हजार जबकि गांव को 12 हजार रुपये दिए जा रहे हैं। जबकि, गिट्टी-बालू का दाम, मजदूरी लगभग समान है। बिजली भी शहर की दर पर वसूली जाती है। लोहता की आबादी 70 हजार है। जरूरी है कि ऐसी ग्राम पंचायतों को नगर पंचायत का दर्जा देकर वहां चिकित्सा, शिक्षा सहित अन्य बुनियादी सुविधाओं को बेहतर करने की जरूरत है।
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