वाराणसी। अस्सी घाट पर सोमवार की सुबह संतूर के तारों पर झंकृत लयकारियों के साथ हुई। शाम ढली जानी मानी ओडिशी नृत्यांगना संचिता भट्टाचार्या के भावपूर्ण नृत्य की थिरकन से। मौका था सुबह -ए -बनारस के प्रभाती रागों के सफर के 1100 दिन पूरे होने पर चार दिवसीय संगीत अनुष्ठान के आखिरी दिन का। इस दौरान ताल नाद के अलावा गायन और नृत्य की एक से बढ़कर एक प्रस्तुतियों ने मन मोह लिया।
विश्वकल्याण के लिए पाणिनी कन्या महाविद्यालय की देव कन्याओं की ओर से वेद मंत्रोच्चार के बीच यज्ञ में आहुति के बाद गंगा आरती हुई। इसके बाद प्रसिद्ध संतूर वादक पं. तरुण भटाचार्य ने संतूर पर राग वसंत मुखारी की अवतारणा की। अलाप, जोड़ के बाद मध्य लय झप ताल और फिर तीन ताल में उन्होंने गतकारी की। संतूर पर साथ दिया उनके शिष्य कुमार सारंग ने। तबले पर संगत की ललित कुमार ने। इनके बाद 39 जीटीसी के मिलिट्री बैंड की ओर से वाद्य वृंद की बेजोड़ प्रस्तुति यादगार बन गई। फिर श्रुतिशील उद्धव ने तीन ताल में स्वतंत्र तबला वादन पेश किया। हारमोनियम पर लहरा दिया आनंद किशोर मिश्र ने। इनके बाद पं रवींद्र गोस्वामी ने सितार पर गतकारी की। बांसुरी पर हरि पौडियाल थे। तबले पर संगत की ज्ञानस्वरूप मुख़र्जी ने। पखावज पर आदित्यदीप थे। इनके बाद डॉ शिवानी शुक्ला आचार्य ने गायन पेश किया। हारमोनियम पर साथ दिया पं अशोक झा ने। इनके बाद प्रो. ऋत्विक सान्याल ने ध्रुपद की प्रस्तुति की। राग हंस किंकिणी में सूलताल में निबद्ध रचना के बोल थे- शिव शिव शंकर...। शाम पांच बजे के बाद मंच संभाला सितार वादक प्रो. राजेश शाह ने। उन्होंने सितार पर राग मारवा की अवतारणा की। मध्य लय और द्रुत तीन ताल में उन्होंने गत बजाया। फिर डॉ कमला शंकर ने शंकर गिटार पर राग बिहाग में अलाप के बाद विलंबित तीनताल और मध्य तीनताल में निबद्ध गत बजाया। इसके उपरांत पं देवाशीष डे ने राग केदार में विलंबित एकताल में निबद्ध बंदिश पेश की। बोल थे- चांदनी रात...। तबले पर संगत की किशन रामडोहकर ने। अंत में ओडिशी नृत्यांगना संचिता भट्टाचार्य ने नृत्य के भावों को सजाया। इससे पहले शिल्पायन की छात्राओं ने गायन की बेजोड़ प्रस्तुति की। डॉ रत्नेश वर्मा ने अंगवस्त्रम से कलाकारों को सम्मानित किया। संचालन किया डॉ प्रीतेश आचार्य ने।