वाराणसी। चौताल, सूल ताल की बंदिशों के आलाप और ताल नाद के समन्वय के साथ गुरुवार की शाम ध्रुपद मेला हर किसी के लिए यादगार बन गया। सुरों के आलाप में कुंज गली में रास के वर्णन पर संगीत के गुणी झूम तो सुर बहार पर दिल को छू जाने वाली गतकारी ने मुग्ध कर दिया। इसी के साथ बीएचयू के पं. ओंकार नाथ ठाकुर प्रेक्षागृह में तीन दिवसीय ध्रुपद महोत्सव आरंभ हो गया।
दीप प्रज्ज्वलन के बाद शुरुआत हुई खैरागढ़ से आईं ध्रुपद गायिका सोमबाला कुमार के गायन से। उन्होंने राग भीमपलासी की अवतारणा की। चौताल में निबद्ध बंदिश के बोल ते- कुंजन में रचो रास अद्भुत गत लियो गोपाल की... बेजोड़ प्रस्तुति की। इसके बाद सूलताल में निबद्ध रचना के बोल थे- कैसे निठुर श्याम बिसर गयो धाम...। इनके साथ पखावज पर संगत की पृथ्वीराज कुमार ने। सारंगी पर अनीश मिश्र और तानपूरे पर ऐश्वर्या और गीतिका ने संगत की। इनके बाद मुंबई से आए पुष्पराज कोष्टी ने सुर बहार के तारों संग तन-मन को झंकृत कर दिया। इन्होंने राह हंस किंकिणी की अवतारणा की। आलाप, जोड़, झाला के बाद चार ताल में निबद्ध गत की मोहक प्रस्तुति की। पखावज पर दालचंद शर्मा ने ताल नाद के समन्वय से जमकर तालियां बटोरीं। तानपूरे पर संस्पृति दास गुप्ता ने संगत की। अंत में विख्यात ध्रुपद गायक उदय भवालकर ने आलापचारी की। तानपूरे पर धीरज शर्मा और ऋषभ चतुर्वेदी थे। यह ध्रुपद महोत्सव इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, भारत अध्ययन केंद्र और बीएचयू के संगीत एवं मंच कला संकाय के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित किया गया। इस मौके पर प्रो. कमलेश दत्त द्विवेदी, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के निदेशक डॉ. विजय शंकर शुक्ल, डॉ. के शशि कुमार, प्रो. ऋत्विक सान्याल समेत तमाम संगीतज्ञ उपस्थित थे।