गंगा में जब रईसों की नाव पटइया सजती थी, तब बनारस का रंग कुछ और ही होता था। विजयानगरम्, दरभंगा, चेतसिंह जैसे रजवाड़ों के राजा बजड़ों पर बैठते थे। तवायफों की महफिलें सजती थीं। हुक्के की चिलम में मानिक, पन्ना और पुखराज जड़े होते थे।
लाल, हरे और गुलाबी धुएं के छल्ले गंगा की हवा में तैरते थे। रईसी का आलम ऐसा कि कुछ राजा अपनी अशर्फियां धूप में सुखवाते थे। एक राजा ने कई दिन तक अशर्फियां सूखवाईं, लेकिन वजन कम नहीं हुआ। परेशान सेवकों ने कुछ अशर्फियां गायब कर दीं। तब राजा बोला अब सही में सूखी हैं।
काशी की शान सिर्फ घाट और मंदिर नहीं थे, अखाड़े भी थे। पंडा अखाड़ा दूर-दूर तक मशहूर था। लठैती, मलयुद्ध और पहलवानी बनारसी संस्कृति का हिस्सा थी। लाहौर से आए एक मुस्लिम लठैत ने पूरे बनारस को चुनौती दी थी। उसके लठ में लोहे की रॉड छिपी थी, लेकिन बनारसी लठैत लकड़ दादा ने अपने कौशल से उसे परास्त कर दिया।
बनारस घराने के गुदई महाराज, अमरनाथ-पशुपतिनाथ जैसे कलाकार रोज गंगा स्नान कर शीतला मंदिर पहुंचते थे। वे पहले अपने हाथों से मंदिर की सीढ़ियां साफ करते, फिर दर्शन करते थे। शीतला मंदिर का शृंगार संगीत महोत्सव भी अपने आप में अनोखा था। कभी यहां तवायफें गाकर माता से इस जीवन से मुक्ति मांगती थीं। समय बदला तो शास्त्रीय संगीत और फिर लोक संगीत ने जगह ले ली।
इसी मंच से कभी भोजपुरी गायक और बाद में सांसद बने मनोज तिवारी ने भी शुरुआत की थी। उन्होंने पहली बार गाने के लिए 2500 रुपये मांगे थे तो उन्हें गाने के लिए मना कर दिया गया। बाद में उन्होंने अपनी मर्जी से गाने का अनुरोध किया और गाया काशी में जाके शीश नवाइब हो... इसके बाद वह चर्चित हो गए।