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25 दिन-25 कहानियां: 11 रुपये चढ़ाने वाला कहलाता था रईस, पन्ना-पुखराज से महकती थी गंगा; रोचक जानकारी

Thu, 28 May 2026 11:03 AM IST
Aman Vishwakarma अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।

सार

बड़ी शीतला मंदिर के महंत पं. शिव प्रसाद पांडेय लिंगिया ने बताया कि काशी की शान सिर्फ घाट और मंदिर नहीं थे, अखाड़े भी थे। पंडा अखाड़ा दूर-दूर तक मशहूर था। लठैती, मलयुद्ध और पहलवानी बनारसी संस्कृति का हिस्सा थी। लाहौर से आए एक मुस्लिम लठैत ने पूरे बनारस को चुनौती दी थी। उसके लठ में लोहे की रॉड छिपी थी, लेकिन बनारसी लठैत लकड़ दादा ने अपने कौशल से उसे परास्त कर दिया। 
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बड़ी शीतला मंदिर के महंत पं. शिव प्रसाद पांडेय लिंगिया। - फोटो : संवाद
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विस्तार
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17वीं शताब्दी की बात करें। सुबह की धुंध में गंगा चुपचाप बह रही हैं। घाटों पर कहीं घंटियां बज रही हैं, कहीं भांग घोटी जा रही है। सामने घना वन है। पेड़ों की झुरमुट के बीच पगडंडियां हैं और उन पगडंडियों से होकर डोली गुजर रही है। डोली के आगे-पीछे बनारस राज्य के सिपाही हैं। 

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उनके संरक्षण में दूर-दूर से आए यात्री बाबा विश्वनाथ के दर्शन करने जा रहे हैं। हां, ये वही काशी है, जिसे कभी आनंद कानन वन कहा जाता था। तब शहर इतना छोटा था कि शाम ढलते ही सन्नाटा उतर आता था। छह बजे के बाद लोग घरों में दुबक जाते थे। 

सन 1900 के करीब हमारे पूर्वज गौरी केदारेश्वर मंदिर में चढ़े अक्षत बटोरकर लाते थे। उसी से घर में भोजन बनता था। कभी चावल मिला, कभी दाल, कभी सिधा-पिसान। उसी से पंडों और मंदिरों का खर्च चलता था। काशी के पंडा-पुजारियों के लिए एक कहावत मशहूर थी। कभी घनी घना, कभी मुठ्ठी भर चना, कभी वो भी मना...। जीवन पूरी तरह श्रद्धा और दान पर टिका था। तब सबसे बड़ी दक्षिणा 11 रुपये मानी जाती थी। जो 11 रुपये दे दे, उसे रईस समझा जाता था।
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स्टेशनों पर पंडों के अनुचर हुआ करते थे, जिन्हें भंडर कहा जाता था। वे बाहर से आने वाले यात्रियों को पकड़कर अपने यजमानों तक लाते थे। शुरुआत में यह सेवा थी, लेकिन धीरे-धीरे यही भंडर लूट-खसोट करने लगे। बदनामी पंडा समाज पर आई। इस दौर में बनारसी जीवन भी निराला था। लंगोट, एक गमछा और एक ओढ़ना... बस यही पहचान थी। गंगा पार तक लोग बेफिक्र अंदाज में स्नान-ध्यान करते, भांग-बूटी छानते और अलमस्त घूमते थे। चेहरे पर तनाव नहीं, सिर्फ आनंद दिखाई देता था।

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गंगा में जब रईसों की नाव पटइया सजती थी, तब बनारस का रंग कुछ और ही होता था। विजयानगरम्, दरभंगा, चेतसिंह जैसे रजवाड़ों के राजा बजड़ों पर बैठते थे। तवायफों की महफिलें सजती थीं। हुक्के की चिलम में मानिक, पन्ना और पुखराज जड़े होते थे। 

लाल, हरे और गुलाबी धुएं के छल्ले गंगा की हवा में तैरते थे। रईसी का आलम ऐसा कि कुछ राजा अपनी अशर्फियां धूप में सुखवाते थे। एक राजा ने कई दिन तक अशर्फियां सूखवाईं, लेकिन वजन कम नहीं हुआ। परेशान सेवकों ने कुछ अशर्फियां गायब कर दीं। तब राजा बोला अब सही में सूखी हैं। 
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काशी की शान सिर्फ घाट और मंदिर नहीं थे, अखाड़े भी थे। पंडा अखाड़ा दूर-दूर तक मशहूर था। लठैती, मलयुद्ध और पहलवानी बनारसी संस्कृति का हिस्सा थी। लाहौर से आए एक मुस्लिम लठैत ने पूरे बनारस को चुनौती दी थी। उसके लठ में लोहे की रॉड छिपी थी, लेकिन बनारसी लठैत लकड़ दादा ने अपने कौशल से उसे परास्त कर दिया। 

बनारस घराने के गुदई महाराज, अमरनाथ-पशुपतिनाथ जैसे कलाकार रोज गंगा स्नान कर शीतला मंदिर पहुंचते थे। वे पहले अपने हाथों से मंदिर की सीढ़ियां साफ करते, फिर दर्शन करते थे। शीतला मंदिर का शृंगार संगीत महोत्सव भी अपने आप में अनोखा था। कभी यहां तवायफें गाकर माता से इस जीवन से मुक्ति मांगती थीं। समय बदला तो शास्त्रीय संगीत और फिर लोक संगीत ने जगह ले ली। 

इसी मंच से कभी भोजपुरी गायक और बाद में सांसद बने मनोज तिवारी ने भी शुरुआत की थी। उन्होंने पहली बार गाने के लिए 2500 रुपये मांगे थे तो उन्हें गाने के लिए मना कर दिया गया। बाद में उन्होंने अपनी मर्जी से गाने का अनुरोध किया और गाया काशी में जाके शीश नवाइब हो... इसके बाद वह चर्चित हो गए।
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