पता नहीं, अब वे साथी कहां हैं। नहीं तो पूछता कि अब जब गलियां उतनी संकरी रही नहीं, बड़का कॉरिडोर हो गया है, तो हमारे नए और पुराने विश्वनाथ जी की आपसी जुगलबंदी का क्या किस्सा है! एक किस्सा काशी की अजब सादगी का।
प्रसिद्ध हिंदी आलोचक बच्चन सिंह ने बीएचयू-विद्यापीठ में दूर-देहात से बीए-एमए करने आए अध्येताओं को कविता पढ़ने के लिए आमंत्रित कर लिया। काव्य-पाठ के बाद बीए का एक विद्यार्थी बेहद उत्साह में बोला, जानते हैं जनाब, हम लोगों की कविताएं सुनने के लिए गुरुजी ने किसे बुलवा रखा है? एक परम देहाती आदमी को, जो धोती-कुर्ता पहने हमारे ही साथ जमीन पर शुरू से अंत तक बैठा रहा।
हद तो तब हुई, जब काव्य-पाठ के बाद उसी से उन्होंने कहा कि बताइए, बच्चों की कविताएं आपको कैसी लगीं। और फिर उसने हर कवि की हर कविता को छूते हुए ऐसा व्याख्यान दिया, हिंदी-भोजपुरी दोनों के इस्तेमाल के साथ, कि दंग रह जाना पड़ा। बाद में पता चला कि जिसे वे देहाती समझ रहे थे, वह स्वयं पद्मभूषण, संस्कृत के प्रकांड विद्वान पं. विद्यानिवास मिश्र थे। ऐसे-ऐसे लोग और उनकी सहज-सुलभता के गरब-गुमान के वारिस तो काशी और काशीवासी हैं ही। हां, मगर ढाई दशक में हम जितना बदल गए, बनारस उतना भी नहीं बदला है अभी तक।