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25 दिन-25 कहनियां: चौक वाले बुढ़ऊ बिस्नाथ, बीएचयू वाले जवनकू बिस्नाथ में होती थी जुगलबंदी; पढ़ें रोचक जानकारी

Sun, 31 May 2026 10:26 AM IST
Aman Vishwakarma अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।

सार

श्री बलदेव पीजी कॉलेज (बड़ागांव) के प्राचार्य और साहित्यकार डॉ. प्रकाश उदय के अनुसार, काशी में भोजपुरी बतकही और साधारण बने रहना, बल्कि दिखना, अब तो खैर, स्टेटस सिंबल भी समझा जाने लगा है। वो जो भोजपुरी के उचरते ही ‘नाक कटल’ और ‘पानी-पानी होखल’ वाला सीन था, वह इसके भूगोल से और इस नाते बनारस से भी बीते 25-30 वर्षों में विदा हो चुका है। इस बात को, अगर जरूरी हो, तो जबरी भी मानना-मनवाना चाहिए।
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श्री बलदेव पीजी कॉलेज (बड़ागांव) के प्राचार्य और साहित्यकार डॉ. प्रकाश उदय। - फोटो : संवाद
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विस्तार
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Varanasi News: यही कचौड़ी गली से बीएचयू तक फलती-फूलती भोजपुरी बीच में एक बार लॉलीपॉप जैसी चीजों का सेवन कर ओवरवेट भी हुई थी, मगर अतीत में संस्कृत को शास्त्र और हिंदी को अंग्रेजों के विरुद्ध भाषा-शस्त्र बनाने वाली काशी अब भोजपुरी को भी बहुत करीने से संभाले हुए है। 

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वैरागियों के इस शहर ने मायानगरी को भी भोजपुरी का फॉलोअर तो बना ही दिया है। काशी में महामना के शिक्षा वाले गागर से निकले सागर ने जब से कह दिया कि ‘बंबई में का बा’, तब से तो वह मायानगरी भी काशी और भोजपुरी के बड़े मोहपाश में है।

भोजपुरी ने काशी की गलियों में देश-विदेश की भाषाओं के लिए बहुत पहले से जगह बना रखी है। प्रेम का ढाई आखर कहकर गए कबीरदास से लेकर तेग अली तेग तक और आज तक भोजपुरी की बानी को काशी ने बहुत गौर से सुना है। बीएचयू में इसने एकेडमिक्स की शक्ल में प्रवेश किया तो यहां भी कोर्स और रिसर्च के साथ ऐसी तमाम गतिविधियों को गति मिली।
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बाबा विश्वनाथ से भोजपुरी का एक अपना नाता है। 30 साल पहले तक यह था कि बनारसी भक्तों में चौक-गोदौलिया वाले बाबा को बुढ़ऊ बिस्नाथ (विश्वनाथ) और बीएचयू वाले को जवनकू बिस्नाथ कहने वाले मिल जाते थे। पुराने और नए विश्वनाथ जी के नाम से तो वे जाने ही जाते हैं। तब बिड़ला हॉस्टल के हमारे एक साथी कसम खाकर बताते थे कि कभी-कभी बीएचयू वाले विश्वनाथ जी के न्योते पर गोदौलिया वाले विश्वनाथ जी संकरी गलियों से निकलकर खुले-खुले परिसर में घूमने-टहलने इधर भी आ जाते हैं।

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पता नहीं, अब वे साथी कहां हैं। नहीं तो पूछता कि अब जब गलियां उतनी संकरी रही नहीं, बड़का कॉरिडोर हो गया है, तो हमारे नए और पुराने विश्वनाथ जी की आपसी जुगलबंदी का क्या किस्सा है! एक किस्सा काशी की अजब सादगी का। 

प्रसिद्ध हिंदी आलोचक बच्चन सिंह ने बीएचयू-विद्यापीठ में दूर-देहात से बीए-एमए करने आए अध्येताओं को कविता पढ़ने के लिए आमंत्रित कर लिया। काव्य-पाठ के बाद बीए का एक विद्यार्थी बेहद उत्साह में बोला, जानते हैं जनाब, हम लोगों की कविताएं सुनने के लिए गुरुजी ने किसे बुलवा रखा है? एक परम देहाती आदमी को, जो धोती-कुर्ता पहने हमारे ही साथ जमीन पर शुरू से अंत तक बैठा रहा।

हद तो तब हुई, जब काव्य-पाठ के बाद उसी से उन्होंने कहा कि बताइए, बच्चों की कविताएं आपको कैसी लगीं। और फिर उसने हर कवि की हर कविता को छूते हुए ऐसा व्याख्यान दिया, हिंदी-भोजपुरी दोनों के इस्तेमाल के साथ, कि दंग रह जाना पड़ा। बाद में पता चला कि जिसे वे देहाती समझ रहे थे, वह स्वयं पद्मभूषण, संस्कृत के प्रकांड विद्वान पं. विद्यानिवास मिश्र थे। ऐसे-ऐसे लोग और उनकी सहज-सुलभता के गरब-गुमान के वारिस तो काशी और काशीवासी हैं ही। हां, मगर ढाई दशक में हम जितना बदल गए, बनारस उतना भी नहीं बदला है अभी तक।
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