महाशिवरात्रि पर श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर में 238 साल से चली आ रही परंपरा टूट गई। ऐसा इसलिए क्योंकि महाशिवरात्रि की भोर में विश्वनाथ मंदिर में होने वाली चौथे चरण की आरती बुधवार को दो घंटे विलंब से पूरी हुई। चौथे चरण की आरती सुबह साढ़े छह बजे पूर्ण हो जानी चाहिए थी लेकिन आरती दो घंटे की देरी से पूरी हुई।
ऐसा काशी विश्वनाथ मंदिर के 238 साल के इतिहास में पहली बार हुआ है। मंदिर प्रबंधन और पुलिसकर्मियों द्वारा श्रद्धालुओं को दर्शन कराने के लिए मंदिर में प्रवेश दे दिया गया। भीड़ के चलते वहां से लोगों को हटाने और अगली आरती के लिए पूजन प्रक्रिया शुरू करने में सप्तऋषि आरती के अर्चकों को काफी दिक्कत हुई। ऐसे में रात्रि ढाई बजे समाप्त होने वाली दूसरे प्रहर की आरती करीब सवा तीन बजे पूरी की जा सकी।
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यह आरती रात्रि ढाई बजे पूरी हो जानी चाहिए थी। इस आरती के बाद भी तथाकथित वीआईपी दर्शनार्थियों को मंदिर में प्रवेश दे दिए जाने से तीसरे प्रहर की आरती भी विलंब से शुरू हुई। चौथे चरण की आरती शुरू होने तक यह विलंब दो घंटे तक पहुंच गया। ऐसे में पांच बजे भोर की बजाय चौथे चरण की आरती सुबह सात बजे शुरू हुई।
सप्तऋषि आरती के प्रधान अर्चक पं शशिभूषण तिवारी ने कहा कि महाशिवरात्रि की निशा में बाबा के विवाह की प्रक्रिया से लेकर चारों प्रहर की आरती तक की व्यवस्था सप्तऋषि आरती के अर्चकों के जिम्मे होती है।
इस दौरान मंदिर प्रबंधन का कोई हस्तक्षेप नहीं होता लेकिन बीती रात हर बार आरती के बाद वीआईपी के नाम पर लोगों को पुलिस और मंदिर प्रबंधन से जुड़े लोग दर्शन कराने लग रहे थे जिसके चलते दूसरे प्रहर की आरती से ही विलंब होना शुरू हो गया था।
मंगला आरती होती नहीं, काट दिए टिकट
काशी विश्वनाथ मंदिर
- फोटो : अमर उजाला
श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर में दो सदी से अधिक पुरानी परंपरा टूटने के पीछे मंदिर प्रबंधन की छोटी सी चूक बड़ा कारण बन गई। महानिशा के बाद होने वाली भोर में मंगला आरती नहीं होती। इसके बाद भी मंदिर प्रबंधन ने मंगला आरती के लिए टिकट बेच दिए। मंदिर कार्यालय का कोई भी कर्मचारी यह बताने को तैयार नहीं कि 14 फरवरी की तारीख में मंगला आरती के लिए कितने टिकट काटे गए थे।
वहीं, सूत्रों की मानें तो भोर में साढ़े तीन बजे मंगला आरती के नाम पर दो सौ से अधिक लोगों को मंदिर में प्रवेश दिया गया। कई दर्शनार्थियों ने तो टिकट होने का दावा करते हुए गर्भगृह में जाकर दर्शन करने के लिए हंगामा भी किया था। दक्षिण भारत से आई परंपरा के अनुसार महाशिवरात्रि पर विश्वनाथ मंदिर में पूरी रात बाबा के विवाह की रस्म निभाई जाती है।
इस दौरान चार प्रहर की आरती के बीच ही मंगला आरती का समय निकल जाता है। इसलिए महाशिवरात्रि की भोर में मंगला आरती नहीं होती। बेशक काशी विश्वनाथ का वर्तमान मंदिर रानी अहिल्याबाई होल्कर ने सन 1780 में निर्मित कराया था लेकिन उससे पूर्व भी काशी में विश्वनाथ का मंदिर था। सबसे पहले इस मंदिर का निर्माण आदि विश्वेश्वर महादेव के नाम से किया गया था।
उसके बाद से अब तक करीब साढ़े तीन हजार साल का मंदिर का इतिहास है। कब-कब, कहां-कहां विश्वेश्वर का मंदिर बनावाया गया और कब किस आक्रमणकारी ने इसे तोड़ा, मंदिर की क्या परंपराएं थीं इन सब का लिखित वर्णन उपलब्ध है। 1780 में पुन: विश्वनाथ मंदिर की स्थापना के बाद से पुराने नियमों का पालन ही किया गया। उन्हीं नियमों में से एक नियम महाशिवरात्रि के बाद वाली भोर में मंगला आरती का न होना भी है।
काशी विश्वनाथ मंदिर न्यास परिषद द्वारा पारित योजना के अंतर्गत नियमित दर्शनार्थियों को 31 सौ रुपए में स्मार्ट कार्ड जारी किए गए हैं। महाशिवरात्रि के कुछ दिनों पूर्व दर्जनों लोगों ने स्मार्ट कार्ड बनवाए थे।
महाशिवरात्रि की मध्यरात्रि में बाबा का विवाह देखने के लिए स्मार्ट कार्ड लेकर आए दर्शनार्थियों को प्रवेश नहीं दिया गया। सुरक्षा कर्मियों ने उन्हें यह कह कर लौटा दिया कि ऐसे किसी कार्ड के माध्यम से प्रवेश देने की सूचना उन्हें नहीं है।