वाराणसी। वरुणा कॉरिडोर आकार लेने से पहले ही बिखरने लगा है। घटिया निर्माण के चलते पाथवे की रेलिंग कई जगह टूट चुकी है। मानमाने ढंग से काम होने के कारण वरुणा पुल से सरैयां पुल के बीच कई स्थानों पर चैनलाइजेशन के लिए डाली गई सीवर पाइप लाइनें भी ध्वस्त हो गई हैं। सीवर का पानी एसटीपी में जाने के बजाय सीधे वरुणा में गिर रहा है।
गोमती रिवर फ्रंट की तरह 201.65 करोड़ से बन रहे वरुणा कॉरिडोर में अब तक करोड़ों रुपये खर्च किए जा चुके हैं, लेकिन वरुणा नदी की हालत जस की तस है। निर्माण कार्यों की स्थिति देखकर निर्माण एक साल भी नहीं चल पाएगा। दो दर्जन से अधिक स्थानों पर सीमेंटेड रेलिंग धराशायी हो चुकी है। पाथवे की सीमेंटेड ईंटें भी दरकने लगी हैं। यह निर्माण की गुणवत्ता और मॉनिटरिंग पर सवाल खड़े कर रही है। सीवर का चैनलाइजेशन भी मनमाने ढंग से किया गया है। इसे जैसे-तैसे बनाकर छोड़ दिया गया। जिन प्वांइट्स पर नाले मिल रहे हैं, वहां मानकों का ख्याल नहीं रखा गया। मैनहोल खुले ही छोड़ दिए गए हैं, उन पर ढक्कन नहीं लगाया गया है।
वरुणा कॉरिडोर योजना में अब तक 125 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं। इससे मॉडल कार्य के नाम पर सिर्फ शास्त्री घाट के आसपास काम किया गया है। नदी संरक्षण और सीवर गिरने से रोकने की कार्ययोजना को अमल में लाए बिना आननफानन करोड़ों रुपये खपा दिए गए हैं।
हर बार बारिश के मौसम में मॉडल कॉरिडोर डूब जाता है। पहली बाढ़ में कई निर्माण बह भी गए थे। सपा सरकार के राज्यमंत्री मनोज राय धूपचंडी ने धांधली का आरोप लगाते हुए शिकायत की थी, तब लोहे की रेलिंग की जगह नक्काशीदार पत्थर की रेलिंग लगी। कटान को रोकने के लिए विशेष प्रकार की घास लगाई गई, लेकिन यह कवायद पानी के बहाव के आगे बेकार साबित हुई।
कैंट से आदिकेशव घाट यानी सराय मोहना तक करीब 10 किमी लंबाई में प्रस्तावित वरुणा कॉरिडोर प्रोजेक्ट में बड़ी बाधा नदी की तलहटी तक बने अवैध भवन हैं। अतिक्रमण तो नहीं हटे और किनारे बने होटलों के कारण कॉरिडोर का पाथवे जरूर टेढ़ा कर दिया गया। इसके लिए जिला प्रशासन, वीडीए, राजस्व विभाग और नगर निगम से लेकर सिंचाई विभाग तक जिम्मेदार हैं।