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बसंत पंचमी से शुरू हो जाते थे गांव में फाग गीत

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वाराणसी। शिव की नगरी काशी की होली के अनोखे रंग हर किसी को लुभाते हैं। जो भी आता है वह होली के रंग में बिना रंगे नहीं रहता। कला, संस्कृति और संगीत की नगरी कहे जाने वाले इस शहर में हर पर्व और त्योहार खास होते हैं। बात बनारस की होली की हो, तो वो भी बरसाने और मिथिला जैसी ही खास है।
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शिव को गुलाल समर्पित करके काशीवासी अपनी होली की शुरुआत करते हैं। रंगभरी एकादशी के साथ ही काशी में होली का खुमार हर किसी के सर चढ़कर बोलने लगता है। स्थानीय लोगों के साथ ही बाहर से आने वाले विदेशी पर्यटक भी खुद को रंगने से रोक नहीं पाते हैं। भोजपुरी गायक डॉ. अमलेश शुक्ला गाते हैं सर बांधे मुकुट खेले होली... में होली की मस्ती और रंगों को हर कोई महसूस कर सकता है।
सुबह ए बनारस की होली का अंदाज सबसे जुदा है। होली की मस्ती में तन और मन दोनों उल्लास से सराबोर रहता है। 70 से 90 के दशक में यहां होली सिर्फ रंग, गुलाल से नहीं होती थी। रंग-भंग, गारी और संगीत की जुगलबंदी होली को खास बनाती थी। होली के दौरान जोगीरा भी समसामयिक होता था और राजनीतिक कटाक्ष व ठिठोली हर किसी को लुभाता था। पक्का महाल, पंच गंगा घाट से लेकर अस्सी घाट तक कवियों की टोलियां बैठकर हंसी ठिठोली किया करती थी।
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काशी के लोकगायक डॉ. अमलेश शुक्ला का संगीत 1996 से शुरू हुआ। पं. नरेंद्र झा से शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ग्रहण की है। महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ में 1997 में गीतकार कन्हैया दूबे केडी के साथ मिलकर गायन का सफर शुरू हुआ। अभी तक सौ से अधिक भजन, होली गीत और लोकगायन के एलबम बाजार में आ चुके हैं। गायन के लिए काशी विद्यापीठ रत्न, काशी रत्न और काशी गौरव के साथ ही कई पुरस्कारों से सम्मानित हो चुके हैं।
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