वाराणसी। हिंदी का प्रचार-प्रसार अब विदेशों में बढ़ रहा है। इसकी मुख्य वजह यह है कि वहां रहने वाले प्रवासियों का अपनी मातृभाषा के प्रति विशेष लगाव होना है। यहां न केवल हिंदी माध्यम के स्कूलों की संख्या बढ़ी है बल्कि लोग आपस में संवाद भी कर रहे हैं। बनारस में आयोजित 15वें प्रवासी भारतीय सम्मेलन में भाग लेने आए सुरेश चंद्र शुक्ल (नार्वे) का मानना है कि मातृभाषा से जुड़े रहना गर्व की बात है। इसी उद्देश्य के साथ नार्वे में हिंदी स्कूल की स्थापना कर प्रचार-प्रसार कर रहे हैं।
मूल रूप से लखनऊ निवासी सुरेश चंद्र शुक्ल ‘शरद आलोक’ ने बताया कि नार्वे में रहने वाले प्रवासी भारतीयों में हिंदी को लेकर अलग जुनून दिखता है। विशेषकर स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों को देखने के बाद पता चलता है कि वह अपनी माटी को लेकर कितना सजग है। इसका श्रेय अभिभावकों को जाता है। विदेशों में रहने वाले हिंदी साहित्यकारों में अलग पहचान बनाने वाले सुरेश चंद्र ने बताया कि विदेशों में हिंदी पत्रकारिता को बढ़ाने के उद्देश्य से उन्होंने पहले 1980 से 85 तक नार्वे की पहली हिंदी पत्रिका परिचय निकाली, उसके बाद 1988 से अब तक स्पाइल दर्पण पत्रिका के माध्यम से लोगों को जागरूक कर रहे हैं। बताया कि नार्वे में प्रवासी भारतीयों के बच्चों के लिए कक्षा दस से बारहवीं तक हिंदी भाषा में परीक्षा देने की सुविधा है। हिंदी भाषा में ही रेडियो का प्रसारण होता है।
मिल चुके हैं ये सम्मान
0 उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा यूपी प्रवासी रत्न सम्मान
0 मध्य प्रदेश सरकार की ओर से कविता में भवानी प्रसाद मिश्र पुरस्कार
0 मध्य प्रदेश सरकार की ओर से निर्मल वर्मा पुरस्कार
0 यूपी हिंदी संस्थान से विदेशी हिंदी प्रचार सम्मान