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सीमावर्ती इलाकों में तस्करी

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बलिया। सीमावर्ती इलाकों में दो तरफा तस्करी का धंधा नासूर बनता जा रहा है। तस्करी के जरिए हर महीने करीब 30 करोड़ के सामान इधर-उधर पहुंचाए जाते हैं। लेकिन इसे रोकने के लिए ठोस पहल नहीं होती।
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बिहार से सटे सीमावर्ती इलाके करीब दो दशक से दो तरफा तस्करी के लिए कुख्यात बने हुए हैं। इस पर लगाम लगाने को लेकर पुलिस की सभी कवायदें फेल साबित हुईं। करीब दो माह पहले प्रांतीय सीमावर्ती इलाकों के रास्ते होने वाली तस्करी को लेकर बलिया व बिहार प्रांत के छपरा जिले के जिलाधिकारियों व पुलिस अधीक्षकों ने बैठक कर रणनीति बनाई। लेकिन यह महज कवायद तक ही सीमित होकर रह गई। इतना ही नहीं दो माह पहले नरहीं थाना के कोरंटाडीह डाकबंगला पर डीआईजी आजमगढ़ ने भी पुलिस अधिकारियों के साथ बैठक कर कानून व्यवस्था का जायजा लिया और तस्करी रोकने को कड़े निर्देश दिए लेकिन यह कवायद भी कागजों तक ही सीमित होकर रह गई। आज भी सीमावर्ती इलाकों के रास्ते दो तरफा तस्करी का धंधा बदस्तूर जारी है। बिहार प्रांत से जहां धड़ल्ले से लाल बालू की तस्करी जारी है, वहीं नदियों के रास्ते बिहार प्रांत को शराब भेजने का भी खेल बदस्तूर चल रहा है। तस्करी के लिए कुख्यात नरहीं थाना क्षेत्र के भरौली गंगा पुल का रास्ता तस्करों के लिए मुफीद बना हुआ है। यह पुल भारी वाहनों के लिए पिछले साढ़े चार से प्रतिबंधित है और पुल के दोनों सिरे पर लोहे का एंगल लगा है। लेकिन मिनी ट्रकों व पिकअप आदि छोटे वाहनों से अनाज, शराब, पशु आदि को जहां बिहार भेजा जाता है वहीं बिहार से रेडीमेड, कोयला, सरिया, लाल बालू, तेंदू पत्ता, सीमेंट आदि यूपी में लाया जाता है। नरहीं थाना क्षेत्र के बड़काखेत के दियरांचल का इलाका अवैध शराब तस्करी का हब बन चुका है। इसी तरह बैरिया, बांसडीह, उभांव, सिकंदरपुर, मनियर का दियरांचल इलाका भी तस्करों के लिए सेफ जोन बना हुआ है। सीमावर्ती इलाकों के रास्ते हर महीने करीब 30 करोड़ से अधिक का व्यापार होता है और इसके जरिए हर माह लाखों के राजस्व की क्षति होती है। लेकिन इसे रोकने को लेकर कभी भी कोई ठोस पहल नहीं होती।
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