महामारी के कारण शिपमेंट में 50 से 60 दिन का समय लग रहा है। हमारा प्रयास है कि वहां से जियोलाइट को एयरलिफ्ट करा लिया जाए जिससे कि बाकी के प्लांट को जल्दी तैयार किया जा सके। कमिश्नर दीपक अग्रवाल ने बताया कि यह ऑक्सीजन प्लांट चंदौली में स्थापित किया जाएगा। ट्रायल में ऑक्सीजन उत्पादन की क्षमता और गुणवत्ता दोनों बेहतर मिली है।
बताया कि ऑक्सीजन को तैयार करने में 50 साल पुरानी तकनीक का ही इस्तेमाल किया गया है। ऑक्सीजन को नॉन-क्रॉयोजेनिकली तरीके से भी गैस फॉर्म में उत्पादित किया जा सकता है। इसके लिए प्रेशर स्विंग एब्जॉप्रशन तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है। इस तकनीक में उच्च दबाव में गैस ठोस सतहों की ओर आकर्षित होती है। दबाव जितना ज्यादा होगा, गैस का एब्जॉप्र्शन उतना ही ज्यादा होगा।
इस तकनीक में अगर नाइट्रोजन को ऑक्सीजन से ज्यादा स्ट्रॉन्ग तरीके से आकर्षित करने वाले जियोलाइट के एब्जॉर्बेंट बेड वाले वेसल में हवा को दबाव से गुजारा जाता है तो नाइट्रोजन उस बेड में रह जाती है। वेसल से निकलने वाली गैस में ऑक्सीजन की मात्रा ज्यादा होती है। इस तरीके से अस्पताल वहीं के वहीं हवा से ऑक्सीजन जनरेट करने वाली डिवाइस भी लगाते हैं। ऑक्सीजन कंसन्ट्रेटर इसी तरीके पर काम करते हैं।
सबसे पहले प्रक्रिया में हवा को ठंडा करके उसमें से फिल्टर के जरिये धूल, तेल, नमी अन्य अशुद्धियों को निकाला जाता है। ऑक्सीजन प्लांट में हवा में से ऑक्सीजन को अलग कर लिया जाता है और एयर सेपरेशन तकनीक का उपयोग किया जाता है। यानी पहले हवा को कम्प्रेस किया जाता है, जिससे अशुद्धियां इसमें से निकल जाए।