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कहीं छिन न जाए सिटी ऑफ म्यूजिक का ताज

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वाराणसी। काशी से यूनेस्को सिटी ऑफ म्यूजिक का तमगा छिनने की आशंका गहराने लगी है। यूनेस्को द्वारा काशी को विशिष्ट श्रेणी में शामिल करने के बाद एकाध प्रयास को छोड़ दें तो यहां के गीत, संगीत और गुरु-शिष्य परंपरा पर खास काम नहीं हुआ। इस साल भी यही हाल रहा तो सिटी ऑफ म्यूजिक की समीक्षा में काशी के अंक कम हो जाएंगे और इस साल 11 दिसंबर के बाद इसकी अवधि बढ़ाने में दिक्कत आ सकती है।
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2015 में काशी की वर्षों पुरानी गीत-संगीत की पंरपरा को नई पहचान मिली थी। यूनेस्को द्वारा काशी को सिटी ऑफ म्यूजिक में 11 दिसंबर, 2015 को शामिल किया गया। यूनेस्को की वेबसाइट पर वाराणसी की गीत-संगीत से जुड़े लोगो के साथ खास बातों को साझा किया गया। वेबसाइट पर क्रिएटिव सिटी के तौर पर यहां की उपलब्धियों पर विशेष पेज भी तैयार किया गया है। इसमें 350 साल पुरानी परंपराओं जैसे गुलाब बाड़ी, बुढ़वा मंगल, रामलीला, जुगलबंदी फ्यूजन की भी सराहना की गई है। तत्कालीन महापौर राम गोपाल मोहले को यूनेस्को की ओर से भेजे गए पत्र में चार साल के बाद इसकी समीक्षा की बात कही गई थी।
सिटी ऑफ म्यूजिक का टैग मिलने के बाद प्रत्यक्ष तौर पर 17 अप्रैल, 2017 को केवल सुरगंगा का आयोजन किया गया। जानकार मानते हैं कि इससे दूसरे देश के कला प्रेमियों में काशी की परंपरा व संगीत को देखने, समझने के प्रति रुझान बढ़ा है। फिर भी इसके विस्तार के लिए और प्रयास किए जाने की जरूरत है।
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इनसेट--
काशी संगीत से जुड़ीं हस्तियां-
- भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खां-शहनाई
- पं. रविशंकर- सितार
- पं. किशन महराज-तबला
- पं. ओंकारनाथ ठाकुर-गायन
- गिरिजा देवी- गायन
- पं. राजन-साजन मिश्र - गायन
छन्नू लाल मिश्र-गायन
प्रो. ऋत्विक सन्याल -गायन
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