वाराणसी। रानी लक्ष्मीबाई। एक ऐसा नाम जो स्त्री शक्ति की मिसाल बन गया। ऐसी मिसाल जो युगों-युगों तक दी जाती रहेगी। काशी में जन्मी वीरांगना लक्ष्मीबाई का नाम इतिहास के पन्नों में स्वर्णाक्षरों में दर्ज है।
रानी लक्ष्मीबाई की संघर्ष यात्रा पर लंबे समय से शोध कर रहे उपेंद्र विनायक सहस्त्रबुद्धे ने बताया कि विवाह के बाद काशी विश्वनाथ के दर्शन को रानी लक्ष्मीबाई दोबारा काशी आई थीं। इस दौरान उनके पति राजा गंगाधर राव भी मौजूद थे।
सहस्त्रबुद्धे बताते हैं कि 1830 ई. में लक्ष्मीबाई के पिता पुरोहित मोरोपंत तांबे पत्नी भागीरथी बाई के साथ तात्कालिक बाजीराव घाट (सिंधिया घाट और मणिकर्णिका घाट के बीच) पर बस गए। 19 नवंबर, 1835 को रानी लक्ष्मीबाई का जन्म हुआ। पड़ोस के घाट के नाम पर ही रानी लक्ष्मीबाई के बचपन का नाम मणिकर्णिका पड़ा। उन्हें मनु भी पुकारा जाता था। मनु ने यहीं पर शस्त्र विद्या और तैराकी सीखी। मोरोपंत तांबे पेशवा बाजीराव के बुलाने पर बिठूर चले गए। उस समय रानी लक्ष्मीबाई की उम्र लगभग पांच साल थी। बनारस में दो तांबे परिवार थे एक रामघाट के पास और एक गायघाट के पास। मराठी परंपरा के अनुसार शादी के बाद मनु का नाम रानी लक्ष्मीबाई पड़ गया।
1853 में अपने पति गंगाधर राव की मौत के पश्चात रानी लक्ष्मीबाई ने झांसी का शासन संभाला। 18 जून 1858 को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की इस अद्भुत वीरांगना ने अंतिम सांस ली पर अंग्रेजों को अपने शौर्य-पराक्रम का लोहा मनवा दिया।