वाराणसी। जमाना देख ले क्या-क्या मेरे हुसैन से है...। 1439 हिजरी का मुहर्रम, शहादत-ए-हुसैन का 1379वां साल, सरजमीं-ए-बनारस पर अपने आप में एक मिसाल बन गया। सैकड़ों ताजिये, हजारों अलम और लाखों लोगाें के मजमे के बीच तिरंगा भी लहरा रहा था। नौहों की सदाओं और जंजीर व कमा के मातम ने कभी न भूलने वाले मंजर को बयां कर दिया। ताजियों के जुलूस के आगे फन-ए-सिपहगिरी के हैरतअंगेज कारनामे भी देखते बने।
यौम-ए-आशूरा यानी मुहर्रम पर रविवार को इमाम हुसैन और शहीदाने करबला को लोगों ने शिद्दत से याद किया। अलग-अलग इलाकों से सुबह दस बजे से जो ताजियों का जुलूस निकला तो देर शाम तक करबला में ताजिये ठंडे किए गए। ताजियों का ये जुलूस दरगाह-ए-फातमान, लाट सरैया इमामबाड़ा और शिवाला घाट की ओर से रवां दवां रहा। नारे तकबीर, नारे रिसालत, नारे हैदरी और हुसैनियत जिंदाबाद के नारों के साथ बच्चे, नौजवान, बुजुर्ग सभी ताजियों के साथ करबला जाने को बढ़ते नजर आए।
बेनियाबाग पर बाकर हुसैन के इमामाबाड़े से 300 साल पुराना दुलदुल का जुलूस जैसे ही नई सड़क चौराहे पर आया, मातमदारों ने जंजीर और कमा के मातम से खुद को लहूलुहान कर लिया। जुलूस के पीछे ताजियों का बड़ा हुजूम, हर तरफ से छोटे-बड़े ताजिये दरगाहे फातमान की ओर बढ़ रहे थे। कुछ ऐसा ही माहौल सदर इमामबाड़ा की ओर से भी देखा गया। इसी तरह शिवाला से उठा जुलूस जब गौरीगंज पहुंचा तो वहां भी मातमदारों ने जंजीर व कमा से मातम किया। शहर की मशहूर ताजियों में भीड़ देखते बनती थीं। बुर्राक का ताजिया, रांगे का ताजिया, नगीने का ताजिया, मोटे शाहबान का ताजिया, काबिले जिक्र रही।
इसी तरह बड़ा ताजिया, लकड़ी, शीशे का ताजिया समेत दालमंडी, नई सड़क, बेनियाबाग, लल्लापुरा, आदि इलाकों का ताजिया जैसे चपरखट का ताजिया, पीतल, फूल, कागज का ताजिया समेत सैकड़ों ताजिये फातमान में ठंडे किए गए। इसमें काशीपुरा का इको फ्रेंडली ताजिया भी खास रहा जो कि पत्तियों से बनाया गया था। ताजियों की जियारत करने के लिए, उसे छूकर मन्नत मांगने के लिए ख्वातीन ही नहीं बच्चे और बड़े भी जुलूस में शामिल रहे। इसी तरह बड़ी बाजार, दोषीपुरा, काजी सादुल्लापुरा, लड्ढनपुरा, जैतपुरा, बाकराबाद का मशहूर मोटे शाहबान, नगीने वाला ताजिया, जाली वाला ताजिया आदि लाट सरैया इमामबाड़ा जाकर ठंडे किए गए। उधर लोहता में ताजियों का जुलूस निकला जिसमें चांदी की ताजिया खास रही। कई जगहों के जुलूस में ताजियों को हिंदू भाईयों ने पूरी अकीदत के कंधा दिया। उधर शहर में तकरीबन के एक दर्जन से अधिक जुलूस शिया हजरात ने उठाए जिसमें 28 अंजुमनों ने नौहा व मातम किया। लोग दुलदुल की जियारत करने के लिए दूर दूर से फातमान ओर सदर इमामबाड़ा पहुंचे। इस मौके पर लोगाें ने इमाम हुसैन और शहीदाने करबला की याद में फातिहा कराने के लिए कहीं खिचड़ी, कहीं हलवा बनाया। किसी ने शरबत पिलाया, किसी ने पानी की सबील लगाई। जगह-जगह तंजीमों ने स्टाल लगाकर अजादारों और ताजियादारे का खैरमकदम किया।