वाराणसी। संगीत प्रदर्शन का नहीं मूलत: अध्यात्म और प्रेम का विषय है। इसे अगर सही ढंग से नई पीढ़ी को हस्तांतरित नहीं किया जाएगा तब तक इसे बचा पाना बेहद मुश्किल है। उक्त बातें रविवार को पद्मभूषण पं. साजन मिश्रा ने कहीं। वह रविवार को आयोजित व्याख्यान शृंखला बनारस संगीत घराने की गुरुकुल परंपरा को संबोधित कर रहे थे। कार्यक्रम का आयोजन क्षेत्रीय पुरातत्व इकाई, इंटैक वाराणसी अध्याय एवं पिलग्रिम्स पब्लिशिंग के संयुक्त तत्वावधान में किया गया।
उन्होंने कहा कि वर्तमान दौर शॉर्टकट का है। इस दौर की कसौटी पर शास्त्रीय संगीत खरा नहीं उतरता है। यह साधना का विषय है। बिना इसके इसे साधा नहीं जा सकता है। अब वह दौर आ गया है जब हमको शास्त्रीय संगीत के उत्थान के लिए घरानों से ऊपर उठना होगा। मौजूद वक्ताओं के प्रश्न का जवाब देते हुए पं. मिश्रा ने कहा कि बनारस घराना सभी घरानों से बड़ा है। इस घराने में गायन की सभी परंपराओं का समावेश है। बनारस घराने की मूल विशेषता है कि इसने गंगा जमुनी तहजीब का अपने अंदर समाहित किया है। बड़े आयोजनों के दौरान गायक एक दूसरे के कार्यक्रम के दौरान उपस्थित नहीं रहने के सवाल पर पं. मिश्र ने कहा कि यह नया प्रचलन आ गया है। पहले ऐसा नहीं होता था। पहले जब आयोजन होते थे तो सभी कलाकार उपस्थित रहते थे। सभी एक दूसरे से सीखते थे। वर्तमान में समय और धैर्य की कमी के कारण ऐसा नहीं हो रहा है। यह अच्छी परंपरा नहीं है।
कार्यक्रम का संचालन क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी डा.सुभाष चंद्र यादव, स्वागत अशोक कपूर और संचालन रामानंद तिवारी ने किया। इस अवसर पर मुख्य रूप से अशोक गुप्ता, डा. वनमाला पर्वतकर, श्रीमती सुचरिता गुप्ता, पं. देवाशीष डे, पं धर्मनाथ मिश्र कन्हैयालाल मिश्र, डा. विजय शंकर शुक्ला, जितेद्र नाथ मिश्र, हरेराम द्विवेदी आदि लोग उपस्थित रहे।