वाराणसी। बिना बनारसी साड़ी के शादी की पूरी तैयारी ही अधूरी सी लगती है। एक ऐसा शिल्प, जिसका फैशन के साथ ही भारतीय परंपरा से गहरा रिश्ता बन गया है। परंपराओं में पिरोये बनारस के इस अनूठे शिल्प की एक नई चमक अब आप पंडित दीनदयाल हस्तकला संकुल में देख सकते हैं। कांच के घेरे में रोशनी के विविध संयोजनों के बीच यहां प्रदर्शित बनारसी साड़ी के एक से एक नमूने आपका मन मोह लेंगे। बुनकरी के बारीक पहलुओं से रूबरू कराने के लिए बनारसी साड़ी तैयार करते समय की थ्रीडी इमेज भी लगाई गई है। बाहर से आ रहे पर्यटकों और खरीदारों के लिए यह नया अहसास बेहद खास बन गया है। वहीं, इसके जरिए लाखाें बुनकरों के रोजगार और शिल्प को नई ऊंचाई मिलने की उम्मीदों को नए पंख लग गए हैं।
बनारस की साड़ी देश ही नहीं, पूरी दूनिया में अपनी अलग पहचान रखती है। इसके शिल्प के प्रशंसकों में बनारस के सांसद एवं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी हैं। कई बार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर वह बनारसी साड़ी के अनूठे शिल्प की प्रशंसा कर चुके हैं। दीनदयाल संकुल के हस्तकला संभाग में अत्याधुनिक तकनीक और रोशनी संयोजनों के बीच बनारसी साड़ी के आकर्षण को बेहद दिलचस्प अंदाज में पेश किया गया है। यहां साड़ियों की एक से एक किस्में आप देख सकते हैं। साड़ियों के साथ उनकी खूबियां भी दर्शाई गई हैं। साथ ही, उसकी पूरी निर्माण प्रक्रिया भी थ्रीडी इमेज के जरिए आप देख सकते हैं।
प्राचीन काल से साड़ी की बुनाई, ब्रोकेड एवं विभिन्न तरह के रेशमी एवं सूती वस्त्र तैयार करने में बनारस अपनी अलग पहचान रही है। पहले बनारसी साड़ियां सिर्फ अकड़ा-मंडा, नाका-जाला-टाका विधि से तैयार की जाती थीं। इस तकनीक की साड़ियां आज भी पूरी दुनिया में बनारस की हस्तकला और बिनकारी का उत्कृष्ट नमूना हैं। समय के साथ जकार्ड का चलन बढ़ा और फिर इसके जरिए बनारस वस्त्र उद्योग में तकनीकी के नए दौर की शुरुआत हुई। लगभग 1500 करोड़ रुपये के सालाना कारोबार वाले इस घरेलू उद्योग से लगभग छह लाख लोग परोक्ष और अपरोक्ष रूप से जीविकोपार्जन कर रहे हैं। शासन, प्रशासन का अपेक्षित सहयोग न मिलने के चलते मौजूदा समय बड़े पैमाने पर बनारसी वस्त्र के नाम पर डुप्लीकेसी की जा रही है। बनारसी शिल्प के नाम पर चीन के नकली उत्पाद चुनौती बन गए हैं। वहीं, देश में भी कई स्थानीय मिलों की साड़ियों को बाजार में बनारसी साड़ी के नाम पर बेचा जा रहा है। दीनदयाल संकुल के हस्तकला संभाग के जरिए कोशिश है बनारसी शिल्प को अंतरराष्ट्रीय बाजार मुहैया कराने और इस उद्यम से जुड़े लाखों लोगों के रोजगार और पहचान को मजबूत बनाने की।