वाराणसी। हुकूमत का हर इनाम है बंदूकसाजी पर मुझे कैसे मिलेगा मैं तो बैसाखी बनाता हूं... शायर मुनव्वर राना की पंक्तियां भले ही व्यवस्था पर करारा वार हों, आईआईटी बीएचयू के कुछ संवेदनशील विद्यार्थियों ने एक बच्चे के लिए सेंसर युक्त बनावटी हाथ बनाकर उसे वरदान दे दिया। स्कूल आफ बायोमेडिकल इंजीनियरिंग के शोध छात्र आलोक ने अपने सहयोगियों की मदद से 14 साल के बच्चे आनंद के लिए बनावटी हाथ तैयार किया है, जिसका हाथ पांच साल में ही कट गया था। 14 साल का आनंद अभी कक्षा तीन में पढ़ रहा है लेकिन दाहिना हाथ न होने से उसे बड़ी मुसीबत झेलनी पड़ती थी। अब वह हाथ पाकर खुशी से झूम रहा है।
आईआईटी बीएचयू के स्कूल ऑफ बायोमेडिकल इंजीनियरिंग में शिक्षक डॉ. शीरू शर्मा के निर्देशन में शोध करने वाले डॉ. आलोक ने इसमें एक खास तरीके के सेंसर का इस्तेमाल किया है। इस बनावटी हाथ के लगाने के बाद आनंद अब दैनिक कार्यों को आसानी से करने के साथ हर जरूरत पूरी कर रहा है। आनंद की आलोक से मुलाकात लिंबडी हॉस्टल के पास एक चाय की दुकान पर दूध लाने वाले उसके चाचा के माध्यम से हुई। खास बात यह है कि इसी तरह की समस्या उसके चाचा बाबू लाल यादव के साथ भी दी। आलोक ने अपनी टीम की मदद से उनके लिए भी इसी तरह का हाथ तैयार किया। बनारस में विकलांग बच्चों की मदद करने वाली एक संस्था के देखरेख में पढ़ाई करने वाला आनंद अब इन भावी इंजीनियराें के साथ ऐसे घुल मिल गया है, जैसे वह इनके साथ लंबे समय से रहा रहा है।
आलोक के मुताबिक आनंद को जब उन्होंने देखा और जांच कराई तो पता चला कि उसके मांशपेशियों में अभी वो सिग्नल मिल रहे थे, जिससे कि आर्टिफिशियल हाथ को लगाकर ठीक किया जा सकता है। एक मसल सेंसर की मदद से हाथ तैयार किया गया है, जिसे उसे लगाया गया। आलोक के साथ सहयोग करने वालों में बिंदू, रवि, अजय, आनंद, स्नेहलता राय शामिल हैं। बताया कि बिना मूवमेंट वाला बनावटी हाथ ही बाजार में 4-5 हजार में मिलता है। इस हाथ को बनाने में महज 3 हजार में ही खर्च आया। यह बाजार में करीब 50 हजार से कम में नहीं मिलेगा। बीएचयू के डिजाइन इनोवेशन सेंटर की मदद से इस प्रोजेक्ट को आगे बढाया जाएगा।