वाराणसी। रामचरित मानस पर आधारित नाटक चित्रकूट के संगीतमय मंचन ने सोमवार की रात रंग विन्यास और अभिनय के ऊंचे मानकों पर स्थापित हुआ। शहर की मशहूर नाट्य संस्था रूपवाणी के कलाकारों ने राम के चरित्र को वन गमन से लेकर लंका विजय और फिर अयोध्या वापसी तक को रंग प्रयोगों में जीवंत किया। यह नाट्य प्रस्तुति लोहटिया स्थित विवेकानंद स्कूल में रूपवाणी के स्टूडियो में हुई।
देश के मूर्धन्य रंग निर्देशक पद्मश्री बंशी कौल की मौजूदगी में गोस्वामी तुलसी दास रचित राम चरित मानस के प्रसंगों को चित्रकूट नाटक में भावपूर्ण तरीके से मंचित किया गया। चित्रकूट की कहानी राम के वनवास से शुरू होकर रावण वध के बाद भरत मिलाप तक पूरी होती है। बनारस की रामलीला के शिल्प में सजी इस नाट्य प्रस्तुति में बनारस घराने का संगीत खास बन गया। शास्त्रीय संगीत के साथ लोक धुनों का भी पुट बेहद कर्णप्रिय था। विशेषज्ञों ने इसे रूपवाणी की लोकप्रिय प्रस्तुति ‘राम की शक्ति पूजा’ की तरह सराहा । राम की भूमिका में स्वाति, सीता की भूमिका में नंदिनी, लक्ष्मण की भूमिका में कॉजोल, हनुमान की भूमिका तापस और सुग्रीव की भूमिका विशाल ने की। साधु रावण आकाश, मारीच की भूमिका साक्षी और रावण की भूमिका में हेमंत ने अभिनय किया। इस मौके पर डॉ.शकुंतला शुक्ला, ब्रजेश पाठक, आशीष मिश्र, धीरेंद्र मोहन, संतोष राय, बीना सिंह, जेपी शर्मा उपस्थित थे।निर्देशन किया रूपवाणी के निदेशक व्योमेश शुक्ल ने।
सबकुछ मिट जाने के बाद भी बचा रहेगा थिएटर का अस्तित्व:बंशी कौल
वाराणसी। राष्ट्रकुल खेल -2012 के समारोह को डिजाइन करने वाले प्रख्यात रंग निर्देशक पद्मश्री बंशी कौल का कहना है कि मुफ्त मनोरंजन के साधनों की चाहे जितनी भी भरमार हो जाए, लेकिन परफार्मिंग आर्ट की प्रासंगिकता कभी खत्म नहीं हो सकती। रंगमंच की तुलना मनोरंजन के साधनों की तकनीक से नहीं की जानी चाहिए। दूध बेचने वाली फैक्ट्रियां एक साथ हजारों लोगों के पास दूध पहुंचा देती हैं लेकिन इसके बावजूद जिस तरह दुधारू गाय का महत्व बना रहता है उसी तरह थिएयर भी सबकुछ मिट जाने के बाद भी अपना अस्तित्व बनाए रखेगा।
अमर उजाला से बातचीत में बंशी कौल ने कहा कि थियटर के पास दो सौ -सौ दर्शक होना भी पर्याप्त है। उन्होंने कहा कि जब कभी पृथ्वी पर सब खत्म हो जाएगा तब परफार्मिंग आर्ट का परिवार बचा रहेगा। उन्होंने उदाहरण दिया कि जब सिनेमा हाल में जाते हैं और बिजली चली जाती है तब सब कोलैप्स हो जाता है लेकिन बिजली चली जाए तब भी रंगमंच कोलेप्स नहीं हो सकता। दर्शकों की कमी से घबराने की जरूरत नहीं है। रंग मंच आनंद को साझा करने का मंच है। इससे पहले कलाकारों से बात करते हुए बंशी कौल ने कहा कि शास्त्रीय प्रस्तुति के बीच में भी कुछ अनौपचारिकता होनी ही चाहिए। ऐसी लापरवाही ही हमारे इंसान होने का सबूत है। प्रस्तुति को सिर्फ संगीत और संवादों से नहीं खामोशी से भी अर्थ मिलते हैं। रंगमंच को मौन की इज्जत करना सीखना चाहिए। जीवन में भले ही कम हो, कला में खामोशी की बहुत जरूरत है। खामोशी के साए में ही कोई प्रस्तुति अर्थवान बनती है।