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हम सारी उम्र जिनको समझते हैं अजनबी, उन्हीं से कोई वास्ता निकलता है...।

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वाराणसी। हम सारी उम्र जिनको समझते हैं अजनबी, उन्हीं से कोई वास्ता निकलता है...। कुछ ऐसा ही मिजाज है मेरे शहर बनारस का। गीतकार समीर कहते हैं कि भले मैं बनारस से दूर हूं लेकिन बनारस हमेशा मुझमें रहता है। जहां भी जाता हूं वहां यही मेरी पहचान बनता है। बनारस मेरी जन्मभूमि है तो उससे बड़ा गौरव मेरे लिए कुछ हो ही नहीं सकता। बनारस की हर मायने में अपनी विशेषता है, खूबी है, अपना एक चरित्र है, अपनी एक विरासत है जिसको इस शहर ने संभाल कर रखा है। बनारस की आबोहवा में कहीं न कहीं कला, साहित्य और संगीत है।
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बॉलीवुड का ग्लैमरस संसार कवि हृदय को समीर के नाम से जानता है तो अपना बनारस इन्हें शीतला प्रसाद पांडेय के नाम से बुलाता है। बचपन की चर्चा आते ही पुरानी यादें ताजा हो गईं। खेलते-कूदते, गाते-गुनगुनाते बीता बचपन। कच्चे मकान, तालाब, पोखरे, नाले। ओल्हा-पाती, गुल्ली-डंडा, लुकाछिपी। भैंस की असवारी और पोखरे में छपाछप की वो मस्ती। पगडंडियों से होकर बाजार जाना, गेहूं पिसाना। प्राइमरी स्कूल में पढ़ते समय अक्सर कक्षा से गायब हो जाना। गांव का वह सावन, भादो, मेढ़कों की टर्र-टर्र, उन्हें सब याद है।
उन्होंने बताया कि प्राइमरी की पढ़ाई के बाद बीएचयू से एमकॉम की पढ़ाई पूरी की और 1980 में सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया में 2-3 दिन तक काम भी किया। उसके बाद मैंने एक फैसला लिया कि जो मैं काम कर रहा हूं वो ठीक नहीं है और दिल कह रहा था कि मेरी मंजिल कहीं और है। फि र मैंने 6 अप्रैल 1980 को मां से 500 रुपये लेकर काशी एक्सप्रेस ट्रेन पकड़ी और मुंबई आ गया। मेरे पिता स्वर्गीय अंजान साहब यहां मुंबई में थे और उनका बड़ा नाम हुआ करता था, तो मुझे लगता है कि कहीं न कहीं पोएट्री मेरी रगों में थी। लेकिन पिताजी इस बात के खिलाफ थे कि मैं इंडस्ट्री में आऊं, क्योंकि उन्होंने बहुत ही लंबा संघर्ष किया था। पिता जी ने दो टूक कहा- जितना पैसा मांगोगे दूंगा लेकिन जिस दिन तुम गाने की लाइन बताने के लिए कहोगे, उसी दिन तुम्हें घर से निकाल दूंगा। हालांकि इसके बाद उन्होंने फि ल्मी धुनों आदि के बारे में शुरुआती प्रशिक्षण दिया। अपने ढंग से ट्रेंड किया। आज जो कुछ हूं उन्हीं की ट्रेनिंग की बदौलत हूं। कभी मेरी लिखी पंक्ति अच्छी लगती तो मामूली तारीफ करते लेकिन साथ में यह भी कहते कि इसे और बेहतर कर सकते हो।
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कहा कि मुंबई में ऐसा कोई दर्द नहीं है, जिसे मैंने न झेला हो। लोगों की तरफ से काफ ी अवहेलना मिली और कुछ लोगों ने तो यहां तक कह दिया था कि तुम कभी गीतकार बन ही नहीं सकते। लेकिन उस दौरान मुझे पिताजी की पंक्ति जहन में आती थी कि ‘जग अभी जीता नहीं है, मैं अभी हारा नहीं हूं ...’। मेरे भीतर लड़ने की ताकत थी और लगभग 9 साल की लड़ाई के बाद मुझे जाकर वो फि ल्म मिली जिसकी तलाश थी। उस फि ल्म का नाम था दिल। उसके बाद से लेकर आज तक पीछे मुड़ कर देखना नहीं पड़ा। बनारस की गलियों में पले-बढ़े ख्यात गीतकार समीर का कहना है बनारस बहुत तेजी से बदल रहा है। किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि एक स्थान पर खड़े हो कर बाबा के शिखर और गंगा का दर्शन कर सकेंगे लेकिन बनारस के सांसद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सोच ने इस सपने को साकार कर दिया। बनारस तो पहले से ही देशी-विदेशी सैलानियों और फि ल्म निर्माताओं के आकर्षण का केंद्र था लेकिन सुविधाएं बढ़ने से इस ओर रुझान और भी बढ़ेगा।
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