वाराणसी। रानी लक्ष्मी बाई की जन्मस्थली भदैनी की दीवारें भी वीरांगना की गाथाएं बता रही हैं। दीवारों पर बनी कलाकृतियों में उनके जन्म से लेकर उनके शहीद दिवस तक के जीवन चक्र को उकेरा गया है। इससे पर्यटकों को वीरांगना की जीवन गाथा आसानी से मालूम हो जाती है।
19 नवंबर 1828 को जन्मी रानी लक्ष्मी बाई का जीवन काल 18 जून 1858 तक का रहा। इस छोटी से आयु में उन्होंने अंग्रेजों को धूूल चटा दिया था। उनके बारे में लोग सहज ही जान सकें इसके लिए भदैनी स्थित मंदिर में लो रिलीफ कला पर आधारित जीवन चरित्र बनाया गया है। एक दर्जन से अधिक प्रतिमाओं को वहां लगाया गया है, जिसमें उनके बाल्य काल में नाना साहब के साथ प्रशिक्षण, उनकी घुड़सवारी, अंग्रेजों संग लड़ाई सहित कई प्रसंगों को दर्शाया गया है। बीएचयू फाइन आर्ट के विशेषज्ञ वेद प्रकाश मिश्र ने बताया कि प्रतिमाओं को हाई रिलीफ और लो रिलीफ दो तरह से बनाया जाता है। हाई रिलीफ का मतलब किसी भी प्रतिमा को चारों ओर से देखा जा सकता है। जबकि लो रिलीफ का मतलब किसी पत्थर पर चित्र को उकेरा गया है। इस उभारदार मूर्तियों में वीरांगना के बाल्यकाल से लेकर लड़ाई तक की पूरी जीवनी है, जो आकर्षक होने के साथ ही ज्ञानवर्धक भी हैं।