वाराणसी। जोगीरा सारा.. रा.. रा.. रा.. रा... की हुंकार बनारस की होली का अलग अंदाज दर्शाता है। रंग-राग, आनंद-उमंग और प्रेम-उल्लास का उत्सव होली। होली के गीत-गवनई और हंसी-ठिठोली हर किसी के मन में उत्साह के रंग भरते हैं। देश के हिस्सों में होली के अलग-अलग रूप हैं लेकिन मोक्ष की नगरी काशी की होली अद्भुत, अकल्पनीय और बेमिसाल है। रंगभरी एकादशी से काशी में रंग खेलने का जो सिलसिला शुरू होता वह लगातार छह दिनों तक चलता रहता है। काशी की उत्सवधर्मिता जीवन का एक अलग ही उत्साह जगाती है।
काशी हिंदू विश्वविद्यालय के संगीत एवं मंच कला संकाय के असिस्टेंट प्रोफेसर और ख्याल गायक डॉ. ज्ञानेश चंद्र पांडेय का कहना है कि होली का नाम आते ही बृज और मथुरा की होली का दृश्य हर किसी को बरबस ही याद आता है, लेकिन तीनों लोकों से न्यारी काशी की अड़भंगी होली का तो पूरी दुनिया में जवाब ही नहीं है। अड़भंगी शिव की नगरी की होली भी अड़भंगी है। रंग-भंग और गाली के बिना अधूरी होती है। मिश्र काफी की होली होरी खेलैं नंदलाल बिरज में, होरी खेलैं नंदलाल... की धुन फागुन की मस्ती को बताने के लिए काफी है। बृज में होली में गोपियां नंदलाल के साथ होली की कल्पना करती हैं। उसी तरह काशी में लोग महादेव के साथ होली खेलते हैं। काशी के लोगों द्वारा डमरुओं की गूंज और हर हर महादेव के नारों के बीच एक-दूसरे को भस्म लगाने की परंपरा है।
डॉ. पांडेय गाते हैं आज खेलूं श्याम संग होरी रे, पिचकारी रंगभरी केसर की... और होरी खेलैं रघुवीरा अवध में होरी खेलैं रघुवीरा...। फाल्गुन की एकादशी को यहां बाबा विश्वनाथ की पालकी निकलती है और लोग उनके साथ रंगों का त्योहर मनाते हैं। ऐसी मान्यता है कि बाबा उस दिन पार्वती का गौना कराकर दरबार लौटते हैं। दूसरे दिन शंकर अपने औघड़ रूप में श्मशान घाट पर जलती चिताओं के बीच चिता-भस्म की होली खेलते है। डमरूओं की गूंज और हर-हर महादेव के जयकारे व अक्खड़, अल्हड़, भांग, पान और ठंडाई की जुगलबंदी के साथ अल्हड़ मस्ती और हुल्लड़बाजी के बीच एक-दूसरे को मणिकर्णिका घाट पर भस्म लगाते हैं, तो यह दृश्य देखने लायक होता है।
नेग में काशीवासियों को होली और हुड़दंग की अनुमति दे जाते हैं। कहते हैं साल में एक बार होलिका दहन होता है, लेकिन महाकाल स्वरूप भगवान भोलेनाथ की रोज होली होती है। काशी के मणिकर्णिका घाट सहित प्रत्येक श्मशान घाट पर होने वाला नरमेध यज्ञ रूप होलिका दहन ही उनका अप्रतिम विलास है। बाबा विश्वनाथ की नगरी में यह फाल्गुनी बयार भारतीय संस्कृति का दीदार कराती है। संकरी गलियों से होली की सुरीली धुन या चौक-चौराहों के होली मिलन समारोह बेजोड़ हैं। होली के रंगों में सराबोर जन सारे भेद-भाव भूल कर प्रेम रंग में रंग जाते हैं। जीवन का सारा कलुष, ईर्ष्या-द्वेष, शत्रु-भाव भस्म हो जाता है होली की अग्नि में। उस आग में से निकलता है, कंचन की तरह दमकता और भक्ति, प्रेम सेवा के रस में पगा जीवन। न जाने कब से साल-दर-साल यही क्रम चल रहा है।