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कविताओं में मुखर हुआ धूमिल का जनवाद

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सेवापुरी/वाराणसी। हिंदी समकालीन कविता के दौर के पुरोधा कवि ‘धूमिल’ आज अपने पैतृक गांव खेवली में ही महज चंद लोगों की स्मृतियों में जिंदा हैं। कल ‘धूमिल’ की जयंती है पर उनके गांव से लेकर शहर तक किसी के जुबां पर कोई चर्चा नहीं है।
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धूमिल की पत्नी मूरत देवी (86) का कहना है कि पति ने अन्याय के खिलाफ पूरी उम्र अपनी कलम से समाज को दिशा दी, उसके लिए संघर्ष किया। बदले में उन्होंने कुछ चाहा नहीं लेकिन समाज का क्या फर्ज बनता है..? वे कहती हैं- ‘जयंती मनावै बदे दू साल पहिले विधायक जी आइल रहलेन त कहलन कि गांव में कविजी कऽ मूर्ति लगवाइब लेकिन आज तक कउनो मूर्ति नाहीं लागल..।’ यह बताते हुए उनकी आंखें छलछला उठती हैं।
पुत्र आनंद शंकर पांडेय ने बताया कि पिता जी ने भतसार स्थित प्राइमरी पाठशाला में पढ़ाई की थी। उस विद्यालय में ‘धूमिल पुस्तकालय’ खोलने की मांग सरकार से की गई लेकिन हुआ कुछ भी नहीं। धूमिल के बड़े पुत्र रत्न शंकर पांडेय एलआईसी में और छोटे पुत्र आनंद शंकर पांडेय सेवायोजन विभाग में कार्यरत हैं।
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