गाजीपुर। कृषि विज्ञान केंद्र के सभागार में बुधवार को प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया गया। केंद्र के सस्य वैज्ञानिक डॉ. शिवकुमार सिंह ने 20 प्रगतिशील किसानों को मेड़ पर अरहर की बुवाई की तकनीक के बारे में जानकारी उपलब्ध कराई। बताया कि अरहर की खेती बलुवर मिट्टी से लेकर दोमट मिट्टी में की जा सकती है। इसकी खेती के लिए उचित जल निकास की व्यवस्था होना अति आवश्यक है। बुवाई से पहले भूमि शोधन अति आवश्यक है। इसके लिए फास्फेटिका कल्चर 2.50 किलोग्राम, राइजोबियम 2.50 किलोग्राम, ट्राइकोडर्मा 2.50 किलोग्राम इन तीनों को 100 किलोग्राम गोबर की खाद में मिलाकर 4-5 दिन बाद खेत में मिला देना चाहिए।
प्रशिक्षण में सस्य वैज्ञानिक ने बताया कि एक हेक्टेयर अरहर की बुवाई करने के लिए 12 से 15 किलोग्राम बीज तथा 80 से 100 किलोग्राम डीएपी प्रति हेक्टेयर रेज्ड बेड मशीन से खेत में बुवाई करते हैं। अरहर की बुवाई किसी भी दशा में जुलाई के प्रथम सप्ताह तक अवश्य पूरी हो जानी चाहिए। रेज्ड बेड पर बुवाई करने से उकठा नामक बीमारी से फसल को बचाया जा सकता है। साथ ही साथ अधिक पानी की दशा में भी मेढ़ पर बुवाई लाभप्रद होती है। खरपतवार नियंत्रण करने के लिए किसानों को बुवाई से 20-25 दिन पर तथा 30-35 दिन की अवस्था पर खुरपी की सहायता से खरपतवारों को निकाल लेना चाहिए। बताया कि अगर फसल 20 से 25 दिन की अवस्था तक हो गई है तो खरपतवार नियंत्रण करने के लिए इमेजाथॉपर 7.50 ग्राम 600 लीटर पानी में घोलकर फसल पर स्प्रे करते हैं जिससे खरपतवार को पूरी तरह से समाप्त किया जा सकता है। डॉ. सिंह ने कहा कि इन सभी विधाओं को अगर किसान प्रयोग में लाते हैं तो 25-30 कुंतल दाना, 10 से 15 कुंतल भूसा, 50-60 कुंतल लकड़ी प्राप्त की जा सकती है। एक हेक्टेयर में 18 से 20 हजार रुपए लागत और 45 से 50 हजार रुपए शुद्ध आय प्राप्त की जा सकती है।