जौनपुर। बाकरी मस्जिद के पेश इमाम मौलाना बाकिर रज़ा खान आसिफ ने शनिवार को मस्जिद में नमाज के बाद रमज़ान की फ़ज़ीलत को बयान करते हुए कहा कि रमजान में भूख और प्यास की अहमियत का पता चलता है। उन्होंने कहा कि रमज़ान ख़ुदा का और बरकतों का महीना है। ऐसे में लोगों को चाहिए कि अपने गुनाहों की तौबा करे और मग़फ़िरत के लिए दुआ करें।
उन्होंने कहा कि अगर इस महीने में किसी आदमी को नेक आमाल की तौफ़ीक़ मिल जाए तो पूरे साल यह तौफ़ीक़ उस के शामिल ए हाल रहेगी। और अगर यह महीना बेदिली, बेफ़िक्त्रस्ी, तरद्दुद व इन्तशार के साथ गुज़रेगा तो पूरा साल इसी हाल में गुज़रने का अंदेशा है क्योंकि इस महीने का एक एक लम्हा क़ीमती है। रमजान में रोजा रखना अल्लाह की तरफ से दिया गया हुक्म है, जिसे हर हाल में पूरा करना ही होता है।
खेतासराय : मदरसा अहले सुन्नत एजाजुल उलूम के मौलाना शकील अहमद चिश्ती ने कहा की हदीस शरीफ में है कि सहरी खाने में बरकत है। अल्लाह और उसके फ़रिश्ते सहरी खाने वालों पर दरूद भेजते है। सहरी नही छोड़नी चाहिए चाहे एक घूंट पानी ही पी ले। फतवा आलमगिरी में है कि सहरी खाना और उसमें देर करना सुन्नत है मगर इतनी देर करना मकरूह है कि सुबह सादिक़ शुरू होने का शक हो जाए। मौलाना चिश्ती ने कहा कि सहरी का वक्त सुबह सादिक़ शुरू होने से पहले भोर के वक्त होता है। जब आसमान में उजाले की किरन दिखाई देने लगती है तो सहरी का वक्त खतम हो जाता है। इसके बाद खाने पीने से रोज़ा नही माना जाता है।