वाराणसी। भगवान शिव की बारात में इस बार बनारसी मस्ती और नई काशी का मुद्दा प्रमुख रूप से नजर आएगा। महाशिवरात्रि पर 13 फरवरी को निकलने वाली शिव बारात में इसके अलावा बरसाने की होली और काशी की होली की परंपरा भी झांकियों के माध्यम से प्रस्तुत की जाएगी। काशी की गंगा जमुनी तहजीब की मिसाल शिव बारात में शिव स्वरूप में सांड़ बनारसी और पार्वती के स्वरूप में बदरूद्दीन अहमद होंगे। इसके साथ ही सहबल्ला के रूप में इकबाल अहमद कुरैशी रहेंगे। यह जानकारी शिव बारात समिति के उपाध्यक्ष मुकुंदलाल टंडन ने दी।
मारवाड़ी युवा संघ में शनिवार को आयोजित पत्रकारवार्ता के दौरान उन्होंने बताया कि इस बार की शिव बारात पूरी दुनिया को बनारसी मस्ती और फागुन का एहसास कराने के लिए होलियाना अंदाज में निकलेगी। काशी घराने के पं. छन्नूलाल मिश्रा के गायन होली खेलै मशाने में होली की तर्ज पर शिव बारात निकलेगी। शिव बारात ब्रज की होली और भोजपुर की होली में रंगी नजर आएगी। गुजराती डांडिया पर नृत्य का आकर्षण खास होगा। बारात महामृत्यंजय महादेव से निकलकर जैसे ही चितरंजन पार्क पहुंचेगी तो वधू पक्ष की ओर से दशाश्वमेध व्यवसायी संघ की तरफ से दिलीप तुलस्यान, नरसिंह बाबा बारातियों का स्वागत करेंग्रे। इस दौरान संयोजक दिलीप सिंह मौजूद रहे।
दिलीप सिंह ने बताया कि 1983 में जब श्री काशी विश्वनाथ मंदिर से सोना चोरी हुआ था, तब समूची काशी सड़कों पर उतर आई थी। गजब का गुस्सा था। तभी महाशिवरात्रि का पर्व आया तो हम लोगों ने सोचा कि ऐसा कुछ किया जाए जिससे शासन-प्रशासन पर दबाव बने। ऐसे में प्रसिद्ध साहित्यकार व अधिवक्ता पंडित धर्मशील चतुर्वेदी, प्रमुख व्यवसायी केके आनंद, कैलाश केशरी, वरिष्ठ पत्रकार स्व. सुशील त्रिपाठी व अमिताभ भट्टाचार्या से मैने शिव बारात निकालने की चर्चा की। सभी ने इसकी योजना की तारीफ की और इसकी तैयारी शुरू कर दी गई। इसी तैयारी के बीच एक संकट आया कि शिवलिंग कहां से आएगा और उसे कौन बनाएगा।
इस पर धर्मशील जी ने मो. इकराम खां जो समाजसेवी भी थे और बेहतरीन कलाकार भी। हम लोग खां साहब के पास प्रस्ताव ले कर गए तो उन्होंने थोड़ी देर सोचने के बाद इस चुनौतीपूर्ण कार्य को स्वीकार कर लिया। सिसोदिया ने बताया कि तब बनारस में काले पंखे का रोजगार शबाब पर था। ऐसे में खां साहब ने पंखे की जाली से अरघा बनाया और पीछे वाले भाग जिसमें मशीन होती है उसे मिला कर शिवलिंग तैयार कर दिया। 1983 से 1998 यानी 15 साल तक वही शिवलिंग शिव बारात में प्रमुखता से शामिल किया जाता था। उसके बाद तांबे की शिव प्रतिमा बनवाई गई और अब उस प्रतिमा को ही हर साल बारात में निकाला जाता है।