वाराणसी। मुक्तिबोध का निधन 1964 में हुआ और इसके बाद वह हिंदी साहित्य के आकाश में विस्फोटक रूप से आच्छादित हुए। उनके जीवनकाल में उनका एक भी संग्रह प्रकाशित नहीं हुआ जबकि उनके न रहने के बाद वह उन चुनिंदा कवियों में शुमार हुए जिनकी सर्वाधिक चर्चा हुई और आज भी हो रही है। भारतीय चिंतन परंपरा जहां से उपजती है उस गहराई को छूते हैं मुक्तिबोध। वे छंदमुक्त कविता के सबसे बड़े कवि हैं। यह कहना है वरिष्ठ कवि ज्ञानेंद्र पति का। उन्होंने कहा कि मुक्तिबोध भारतीय चिंतन को अपनी सर्जनात्मकता में आत्मसात करने वाले कवि हैं।
बीएचयू के कला संकाय का राधाकृष्णन सभागार में सोमवार को अरसे बाद मुक्तिबोध जैसे कवि को याद करते हुए गुलाबी सर्दी में भी विचार इस कदर उमड़ते-घुमड़ते निकले कि सांझ ढलने के बाद तक भरपूर गरमाहट महसूस होती रही। भोजपुरी अध्ययन केंद्र, कला संकाय और हिंदी विभाग के शोध छात्रों के प्रयास से सर्जक का पक्ष और मुक्तिबोध शीर्षक से दो दिवसीय आयोजन के पहले दिन सोमवार को अंधेरे में चांद का मुंह टेढ़ा है और ब्रह्मराक्षस जैसी अमर कृतियों के रचयिता हिंदी के इस चर्चित कवि की रचनात्मकता पर सृजन के घर मे शीर्षक परिचर्चा और काव्य गोष्ठी में देश के ख्यातिलब्ध कवियों और आलोचकों ने अपनी बात रखी।
हिंदी विभाग के प्रो. वशिष्ठ अनूप ने कहा कि मुक्तिबोध आज के संदर्भों में ज्यादा प्रासंगिक हैं। जो रचनाकार अपने समय से ज्यादा टकराते हैं, वे समय के बहुत आगे तक जाते हैं। मुक्तिबोध अपने समय टकराने वाले रचनाकार थे। आमजन से उनका जुड़ाव इसी बात से समझा जा सकता है, जब वे लिखते हैं. सभी मानव सुखी-सुंदर और शोषणमुक्त कब होंगे। कवयित्री मनीषा झा ने कहा जयशंकर प्रसाद के बाद मुक्तिबोध सबसे बड़े दार्शनिक कवि हैं। परंतु आज तक उनका सटीक मूल्यांकन नहीं किया जा सका। उन्होंने कहा कि मुक्तिबोध की कविता अपने समय और समाज के भयावह सच को सामने लाती है।
प्रो. चंद्रकला त्रिपाठी ने कहा मुक्तिबोध के निजी जीवन की जो त्रासदी है, निष्फलताएं हैं उन्हें उन्होंने कभी अपनी रचनाओं में शामिल नहीं किया। वे किसी की दया नहीं चाहते थे। मजदूरों की बस्तियां उन्हें खींचती थीं। वे लोग उन्हें आकर्षित करते थे जो हाड़तोड़ मेहनत के बाद भी अपने भीतर का संगीत बजाकर जीते थे।