वाराणसी। ऐसा चाहूं राज मैं जहां मिले सबन को अन्न, छोट बड़ो सभ सभ बसैं रविदास रहैं प्रसन्न...। की तर्ज पर संत रविदास ने जाति-पात, धर्म मजहब के भेद से रहित बिना किसी दुख के शांति और इंसानियत के जिस बेगमपुरा शहर की परिकल्पना की थी, उसके स्वरूप की झलक बुधवार को उनके जन्मस्थान सीर गोवर्धन में मिली। जयंती समारोह में आए पुरुष और महिला श्रद्धालु जात-पात, ऊंच-नीच का भेद मिटाकर गुरु के दर्शन के लिए मगन होकर सड़कों पर निकले। दर्शनार्थियों की लंबी लाइन के कारण सीर की सड़कें और गलियां ठसाठस भर गई थीं। आलम यह रहा कि भीड़ को संभालने के चक्कर में कई बार मुश्किलें हुईं। हजारों की संगत संत की जन्मस्थली के साथ ही पावन कठौती और स्वर्ण पालकी के दर्शन कर निहाल हो उठी।
बुधवार की सुबह 8 बजे संत निरंजन दास महाराज ने सतगुरु रविदास मंदिर में निशान साहब को फहराकर जयंती समारोह का विधिवत उद्घाटन किया। अमृतवाणी के पाठ से पूरा सीर गूंजता रहा। ढोल नगाड़ों की थाप पर नाचते गाते श्रद्धालु अपने गुरू के दर्शन के लिए मंदिर पहुंच रहे थे। सुबह 8:30 बजे भीड़ का आलम यह हो गया कि पुलिस और सेवादारों को भीड़ नियंत्रित करने में काफी मशक्कत करनी पड़ी। सड़कों की पटरियों पर खिलौने भी सजाए गए और खेतों में झूले, चर्खियों पर खुशियों के शोर भी गूंजे। कहीं अटूट लंगर की पांत लगी रही तो कहीं भजनों की टोलियों के झांझ, मजीरे बजते रहे। फूल-मालाओं की दुकानों पर जमकर बिक्री हुई। सीर से दर्शन करके जाने वालों के हाथ में अपने गुरू की तस्वीर भी थी। सत्संग स्थल पर सुबह से ही सांस्कृतिक प्रस्तुतियों का सिलसिला शुरू हुआ जो देर शाम तक चलता रहा। इस दौरान देश और विदेश से आए गायक कलाकारों ने अपनी प्रस्तुति दी। देर शाम को शहर के विभिन्न स्थानों से संत गुरु रविदास पर आधारित झांकियां निकाली गईं।