वाराणसी। दरगाह-ए-फातमान में अंजुमन हैदरी चौक के जेरे इंतजाम रविवार को चौथे साल भी 18 बनी हाशिम का ताबूत पूरी अकीदत और एहतेराम के साथ उठाया गया। ताबूत की जियारत को जाइरीन का हुजूम यहां मौजूद था। जोहर की नमाज के बाद मजलिस का आगाज मशहूर सोजख्वान जनाब शराफत अली ने अपने शागिर्द लियाकत अली, शराफत नकवी और साहब जैदी के साथ दर्द भरे अंदाज में की। शायरों ने कलाम पेश किए। नायाब बलियावी, मायल चंदौलवी, अतश बनारसी, वफा बुतराबी शामिल थे।
मजलिस को खिताब करते हुए मौलाना सैयद मोहम्मद अकील हुसैनी ने कहा कि करबला में इमाम हुसैन और उनके परिवार के 17 सदस्य (भाई, बेटे, भतीजे, भांजे) सबने अपनी कुर्बानी से एक नई तारीख लिखी है। इसमें छह महीने के अली असगर की कुर्बानी आज भी दुनिया याद करती है। मजलिस के बाद ताबूतों का परिचय कैसर नवाब जौनपुरी ने कराया। इस बीच बालक जैन ने दर्द भरी आवाज में नौहे पेश किए। अंजुमन हैदरी के नौजवानों ने ...या हुसैन की सदाओं के साथ माहौल को और गमगीन बना दिया। हर ताबूत की जियारत पर जाइरीन की आंखें छलक पड़ती थीं। संयोजक सचिव अब्बास रिजवी शफक, अध्यक्ष मुर्तजा अब्बास शमसी ने अजादारों का इस्तकबाल किया। फिरोज हुसैन ने शुक्रिया अदा किया। इस मौके पर बनारस के अलावा पूर्वांचल के दूसरे जिलों से लोग ताबूत की जियारत को यहां पहुंचे थे। सैयद फरमान हैदर ने बताया कि 18 बनी हाशिम उन्हें कहा जाता है जो इमाम हुसैन से खून का रिश्ता रखते थे।