वाराणसी। बीएचयू मालवीय मूल्य अनुशीलन केंद्र में आयोजित तीन दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के पहले दिन वक्ताओं ने लोककलाओं, परंपराओं को सहेजने का संकल्प लेते हुए इसके लिए युवाओं को आगे आने का आह्वान किया। ‘भारतीय लोकज्ञान पुनर्नवता एवं पुन: प्रयोग’ विषयक संगोष्ठी के उद्घाटन समारोह में बतौर मुख्य अतिथि बीएचयू के कुलाधिपति न्यायमूर्ति गिरधर मालवीय ने कहा कि भारतीय लोकज्ञान के बिना भारतीयता अधूरी है। ऐसे में लोकज्ञान का प्रचार-प्रसार करने की जरूरत है।
भारत अध्ययन केंद्र, अयोध्या शोध संस्थान और गलगोटिया संस्थान, नोएडा के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित संगोष्ठी में न्यायमूर्ति मालवीय ने प्राचीन लोककलाओं, परंपराओं की विस्तार से चर्चा की। संगीत नाटक अकादमी के अध्यक्ष डॉ. शेखर सेन ने कहा कि भारतीय लोकज्ञान में निहित संस्कृति लोकगीतों में अभिव्यक्त होती है। कुलगुरु प्रो. वीके शुक्ल ने कहा कि आधुनिक चिकित्साशास्त्र के रहते हुए भी लोकज्ञान अपरिहार्य है। अध्यक्षता करते हुए प्रो. कमलेश दत्त त्रिपाठी ने कहा कि लोक एवं वेद में विरोध नहीं है। वेद में ध्रुवता है और वह अक्षुण्ण है। डॉ. धमेंद्र पारे ने जनजातियों के लोकनीति की चर्चा की। डॉ. विद्याबिंदू ने कहा कि हम सहने का संस्कार भूल गए हैं, इस पर अमल करने की जरूरत है।
विषय प्रवर्तन और मंच संचालन करते हुए केंद्र की चेयर प्रोफेसर मालिनी अवस्थी ने कहा कि कला, ज्ञान और परंपरा हमारी थाती रही है, नई पीढ़ी के बीच इसे लेकर जाना होगा। संगोष्ठी में जिन बिंदुओं पर चर्चा होगी, उस पर एक पुस्तक का प्रकाशन कराया जाएगा। अतिथियों का स्वागत प्रो. सदाशिव कुमार द्विवेदी, धन्यवाद ज्ञापन अयोध्या शोध संस्थान निदेशक डॉ. योगेंद्र प्रताप सिंह ने किया। इस दौरान प्रो. रेवा प्रसाद द्विवेदी, डॉ. विजय शंकर शुक्ल, प्रो. चंद्रकला त्रिपाठी, प्रो. अवधेश प्रधान, डॉ. केए चंचल, प्रो. युगल किशोर मिश्र आदि मौजूद रहे।