जौनपुर। रंगभरी एकादशी के बाद होली के रंग-गुलाल उड़ने लगे हैं। होली के गीत भी सुनाई दे रहे हैं। मगर उनमें पारंपरिक गीतों के स्वर जरा कम ही हैं। धमार, चौताल, फाग जैसे गीत सुनने को नहीं मिल रहे हैं।
पारंपरिक होली गीतो में पूर्वांचल की अलग पहचान थी लेकिन अब ये गीत सुनाई नहीं दे रहे हैं। पं छन्नूलाल मिश्र का ‘खेले मसाने में होली दिगंबर’ तो सुनाई दे रहा है लेकिन दूसरे पारंपरिक गीत सुनने को नहीं मिल रहे हैं। जोगीरा गाने वाले भी नहीं है। फिल्म नदिया के पार का होली गीत तो जौनपुर में फिल्माया गया था, लिहाजा जिले में धूम से बजता था। यह सदाबहार गीत भी अबकी सुनने को नहीं मिल रहा है। सवाल-जवाब वाले होली की गीतों में केकरा हाथे ढोलक सोहे, केकरा हाथे मजीरा और उसका जवाब राम के हाथे ढोलक सो है, लक्ष्मण के हाथे मजीरा भी सुनाने को नहीं मिल रहे हैं। होली के पारंपरिक गीतों में राम-सीता, राधा-कृष्ण और शिव को आधार बनाकर गाया जाता था। ‘होरी खेलन आयो श्याम, आज याको रंग में बोरो रे’ कलाकार कहते हैं कि इसे कोई सुनना नहीं चाहता है। अब धूम धड़ाके वाले गीतों को ही सुना जा रहा है, जिनका रूप बहुत भी विकृत है। उनमें बहुत कुछ फूहड़ भी है।