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कालीन उद्योग को अलग बजट मिले तो बने बात

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भदोही। भदोही के मखमली कालीन को दूसरे राज्यों से निर्यात किए जाने के चलते जिले के कालीन कारोबार को झटका लगता दिख रहा है। यही वजह है कि मौजूदा वित्तीय वर्ष में अप्रैल से दिसंबर तक का निर्यात आंकड़ा पिछले वर्ष के मुकाबले 8.41 फीसदी घट गया है। इससे उद्योग जगत चिंतित हो उठा। अब आगामी आम बजट से इस उद्योग को विशेष उम्मीद है। जानकारों का मानना है कि कालीन उद्योग के लिए अलग से बजट का प्रावधान हो तो बात बने।
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आगामी वित्त वर्ष के लिए बजट सत्र शुरू होने के साथ ही कालीन उद्योग में बीते वर्ष के औद्योगिक हालात और बजट में मिलने वाली सौगातों पर चर्चा शुरू हो गई है। 2016 के अंत में सरकार ने नोटबंदी का बड़ा फैसला लिया और 2017 के मध्य में जीएसटी भी लागू कर दिया गया, इसलिए उद्यमी चाहते हैं कि सरकार आम बजट में औद्योगिक क्षेत्रों के ढांचागत विकास और कालीन उद्योग के लिए विशेष प्रावधान की घोषणा बजट में करे। देश का कालीन निर्यात बीते एक दशक से हर वर्ष 10 से 15 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है। 2010 में जो कालीन निर्यात 3500 करोड़ था, वह आज बढ़कर 11 हजार करोड़ पहुंच गया है। लेकिन, भदोही-मिर्जापुर कालीन परिक्षेत्र जहां से कालीन उद्योग का उदय हुआ, वहां का निर्यात गिरता जा रहा है। अखिल भारतीय कालीन निर्माता संघ (एकमा) के पूर्व मानद सचिव रहे हाजी अब्दुल हादी अंसारी कहते हैं कि देश के
कालीन निर्यात में भदोही-मिर्जापुर परिक्षेत्र का कालीन गिर कर 50 से 60 प्रतिशत तक रह गया है। उन्होंने कहा कि यह विडंबना है कि भदोही में ही निर्मित कालीन दूसरे राज्यों के कालीन निर्यातकों के माध्यम से निर्यात हो रहे हैं, जिसके फलस्वरूप उत्तर प्रदेश का निर्यात तेजी से घट रहा है। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार नहीं बल्कि इस पर प्रदेश सरकार को ध्यान देना चाहिए। दूसरे प्रदेशों के उद्यमी भदोही क्षेत्र से कच्चा माल उठाकर ले जाते हैं और निर्यात करते हैं। उधर, भदोही कालीन परिक्षेत्र का निर्यात घटने से भदोही से कालीन शिल्पियों, मजदूरों का तेजी से पलायन हो रहा है। इसको रोकना प्रदेश सरकार के लिए चुनौती से कम नहीं है। अंसारी कहते हैं कि केंद्र और राज्य में वर्तमान में भाजपा की सरकार है। कालीन उद्योग को उबारने का इससे अच्छा समय दूसरा नहीं हो सकता।
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आल इंडिया कारपेट यार्न स्पिनर्स एंड डीलर्स एसोसिएशन (एसिसडा) के अध्यक्ष रमेश काबरा ने कहा कि यदि ढांचागत समस्याओं के चलते यह परिक्षेत्र दूसरे केंद्रों से पिछड़ रहा है। सरकार को चाहिए कि निर्यातपरक उद्योगों के ढांचागत विकास के लिए अलग से बजट की व्यवस्था हो, ताकि समय-समय पर कमियों को दूर किया जा सके।
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