वाराणसी। सनातन धर्म की परंपराओं में धर्म और विद्या के अनादि केंद्र काशी को रामानंद जी ने ही संप्रदाय परंपरा का मुख्यालय बनाया। शैव एवं वैष्णव परंपराओं के अंतर्द्वंद्व की समन्वयात्मक एवं उदात्त चेतना का ही परिणाम था कि रामभक्ति को जनांदोलन का स्वरूप देने वाले धर्माचार्य ने काशी को अपना केंद्र बनाकर राम भक्ति प्रसार को उत्कर्ष प्रदान किया। उक्त विचार जगद्गुरु रामानंदाचार्य जयंती के पर्व पर स्वामी रामनरेशाचार्य ने सोमवार को पंचगंगा घाट स्थित श्रीमठ में आयोजित समारोह के दौरान व्यक्त किए।
स्वामी रामनरेशाचार्य ने कहा कि रामनंदाचार्य जी ने भक्ति में जिस प्रपत्ति या शरणागति मार्ग को प्रकाशित किया वह कल्याण की शाश्वत परंपरा का श्रेष्ठतम अनुकरणीय मार्ग है। यह भक्ति सनातन और अनादि है क्योंकि वेद का भावावतरण ही रामायण में और उन्हीं भावों का लोकप्रसार रामानंदाचार्य ने रामभक्ति के द्वारा किया। परमाचार्य श्रीराम की भक्ति की अनादिधारा को उनके अंशावतार मध्यमाचार्य रामानंदजी ने जन-जन तक पहुंचाकर व्याप्ति प्रदान की। श्रीमठ में जयंती समारोह के दूसरे दिन रामानंद चरणपादुकाजी के सविधि वैदिक रीति से षोडशोपचार पूजन किया गया।
संगोष्ठी में इलाहाबाद के संत मर्मज्ञ विद्वान प्रो. सभापति मिश्र, काशी के पं. गोपी वल्लभ पाठक, अखिलेश मिश्र, संत रामविनय दास, संत राम अयोध्यादास, संत जयराम दास, संत घनश्यामदास, संत श्यामदास, महात्यागी रामचरण दास, संत रामप्रिया दास आदि ने विचार व्यक्त किए। इस दौरान अमूल्य शर्मा, प्रो. सतीश राय, डॉ. उदय प्रताप सिंह, एडवोकेट अंबरीष राय, राजेंद्रनारायण शर्मा, मिथिलेश कुमार, सत्येंद्र पांडेय, पुष्कर उपाध्याय आदि मौजूद थे।