वाराणसी। नगर निगम में 2012 के मुकाबले इस बार मतदान प्रतिशत में तकरीबन दस फीसदी की बढ़ोतरी ने राजनीतिक दलों की बेचैनी बढ़ा दी है। खासकर भाजपा, सपा और कांग्रेस की ओर से इसे अपने-अपने हक में बताने की होड़ लगी है। जीत सुनिश्चित होने के दावे किए जा रहे हैैं लेकिन सियासी सूत्रों का दावा है कि अंदरखाने सबकी बेचैनी बढ़ी है। बढ़े वोट प्रतिशत का गुणा-गणित बैठाने के लिए बूथवार मतदान प्रतिशत की समीक्षा की जा रही है लेकिन अलग-अलग वार्डों में समीकरणों के उतार-चढ़ाव को लेकर पार्टियां उलझन में हैं।
1995 में वाराणसी के नगर निगम बनने के बाद से चुनाव का यह पांचवां मौका है। अब तक नगर निगम की महापौर सीट पर चारों बार भाजपा का ही कब्जा रहा है। शहर में भाजपा के परंपरागत वोटरों की अच्छी-खासी तादाद है। पिछड़ा वर्ग और निमभन आय वर्ग के वोटरों तक अपनी पहुंच के लिए हाल के वर्षों में पार्टी ने लगातार कोशिशें की हैं और परंपरागत छवि को भी तोड़ा है। तीन तलाक के मसले पर कुछ मुस्लिम महिलाओं के भी समर्थन की बात चर्चा में रही है। नगर निगम पर लगातार कब्जा होने के बावजूद यहां की बुनियादी सुविधाओं की खस्ताहाली विपक्षियों के लिए प्रमुख चुनावी मुद्दा बनी। खासकर सपा और कांग्रेस ने भाजपा के नगर निगम के 22 साल के कार्यकाल को मुद्दा बनाया। दोनों ही पार्टियों के लिए परंपरागत वोटरों के साथ ही मुस्लिम मतों का भरोसा है। इस बार जातिगत समीकरणों के आधार पर भी वोटरों के बंटने की बात कही जा रही है। मुस्लिम बहुल इलाकों में वोटिंग प्रतिशत बेहतर रहा है। आम तौर पर भाजपा विरोधी मतदान का रुझान होने के नाते माना जा रहा है कि मुस्लिम मत सपा और कांग्रेस के बीच बंटे। सियासी रणनीतिकारों के मुताबिक इस बार हार-जीत का अंतर कम रह सकता है। भाजपा को कांग्रेस और सपा ने कांटे की टक्कर दी है लेकिन मुस्लिम मत कहीं एक जगह नहीं गए। मतों के इस बंटवारे से भाजपा को लाभ होगा। 2012 के चुनाव में तकरीबन 33 फीसदी वोटिंग हुई थी और भाजपा के रामगोपाल मोहले मेयर चुने गए थे।